नव शक्ति का औषधीय रहस्य |usefull medicion in ayurved

 नव शक्ति का औषधीय रहस्य | life change medicine in aayurved | usefull medicine in aayurved

नव शक्ति का औषधीय रहस्य |usefull medicion in ayurved

       शक्ति की आराधना मार्कण्डेय जी द्वारा कुछ समय तल्लीन भाव से की गई,और उनके आंतरिक शोध के बाद शक्ति का साक्षात हुआ,तदुउपरान्त माँ दुर्गा के आशीर्वाद से मार्कण्डेय ऋषि को ब्रम्हा जी से औषधीय तत्वों का ज्ञान प्राप्त हुआ और इस ज्ञान में कुशल होने हेतु उन्होंने निरन्तर अनुसंधान किया,इस गहरे अनुसँधान में उन्होंने पाया कि नव ऐंसी ओषधियाँ हैं,जिसमें सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड की अलग-अलग शक्ति समाहित है,और इन्हीं शक्तियों के आभाव से इस जगत के प्राणीयों को भिन्न-भिन्न रोगों से गुजरना पड़ता है। नव शक्ति का औषधीय रहस्य life change medicine in aayurved ।

            माँ दुर्गा जी की आज्ञा व उनकी कृपा प्रसाद से मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति का जन्म हुआ,यह पद्धति जीवन को निरोगी और शांत होना सिखाती है-यह कहती कि जीवन मे इन नव औषधीयों के अंदर छुपे हुए रहस्य को जो ठीक ठीक समझ जाये तो उसका सदैव ही शरीर स्वस्थ होगा ही,इसलिए यह पद्धति कहती है कि जब शांत मन होने लगे तब इस मन को माँ की भक्ति में लीन करना होगा। वैसे तो यह चिकित्सा पद्धति ने हर सूक्ष्म पहलुओं में काम करने की कोशिश की है।

अपनेपन के स्पर्श का जादू  मिलेगा,जल्दी करो खिल खिलाती हुई प्रकृति का सानिध्य मिलेगा।

           मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति इस लिए अनूठी है,क्योंकि इसका जन्म - ऐंसा भक्त जिसकी भक्ति चरम पर है,ऐंसा साधक जिसकी साधना हर अंदर के पट को खोल चुकी है,एक अनुसन्धानकर्ता  जो पूर्ण जीवन भक्ति और औषधीय अनुसन्धान की हर छोटी से छोटी जानकारी को एकत्रित किये हुए है। उसके द्वारा सम्पन्न हुआ है। इतना वेशकीमती औषधीयोँ का रहस्य किसी को प्राप्त हो जाये तो वह इनका सेवन तो करेगा ही।इसी कारण तो नव शक्ति का औषधीय रहस्य का जन्म हुआ।usefull medicion in ayurved।

            इसी संदर्भ में मैने भी एक छोटी कोशिश की है कि इस "मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति " के अनुसन्धान से पाठक गण भी लाभान्वित हों तो निश्चित ही ये ओषधीयाँ आपको लाभान्वित कर सकती हैं । आगे इन औषधियों के बारे में संक्षिप्त विवरण प्रस्तूत किया गया है जो आपके लिए रोचक होने वाला है आइए आगे पढ़ते हैं-

नव शक्ति का औषधीय रहस्य |usefull medicion in ayurved

नव औषधीय रहस्य

1) प्रथम शक्ति शैलपुत्री 

         "हरड़"

माँ जैसे पोषण व सुरक्षा प्रदान करने वाली "हरड़" औषधी है।

            नवदुर्गा की नव शक्तियों में प्रथम शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ शैलपुत्री" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "हरड़" नामक औषधी में स्थायी रूप विद्दमान रहती है।

 पहचान (Identifications) :-

 हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली औषधी है।

           अनेक शारीरिक समस्याओं में अत्यंत ही महत्वपूर्ण औषधी है हरड़, जिसका वैज्ञानिक नाम Terminalia chebula है , यह हिमावती है जो कि शक्ति स्वरूपा देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधी में से एक विशेष औषधी है।

गुण (qualities):-

हरड़ के  सात प्रकार हैं , -
                     अथवा 
ऐंसा भी कहा जा सकता है कि हरड़ में सात प्रकार के गुण हैं जो इस प्रकार हैं :- 

पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा यानी कल्याण करने वाली।
प्राणदा - खांसी या गले की समस्या को दूर करने वाली है।

उपयोग :- 

1)हरड़ का काढ़ा त्वचा संबंधी एलर्जी में लाभकारी है। हरड़ के फल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इसका सेवन दिन में दो बार नियमित रूप से करने पर जल्द  विषाणु जनित रोगों में आराम मिलता है। 

2)जीवाणु जनित रोग यदि शरीर के किसी हिस्से में हो गए हैं,तो उस हिस्से की हरड़ के काढ़े से सफाई की जाए तो प्रभावित हिस्सा को ठीक होने में मदद मिलती है।

3)हरड़ का चूर्ण यदि कष्ट हो दांत पर तो इसे लगाने से भी कष्ट काफी हद तक कम हो जाता है। 
 
4)आपको जानकर खुशी होगी कि - हरड़ एक स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक होता है जिसके प्रयोग से बाल काले, चमकीले और आकर्षक दिखते हैं। 

 चलिए एक प्रयोग कीजिये 


     हरड़ के फल को नारियल तेल में उबालकर (हरड़ पूरी तरह घुलने तक) लेप बनाएं और इसे बालों में लगाएं या फिर प्रतिदिन 3-5 ग्राम हरड़ पावडर एक गिलास पानी के साथ सेवन करें। 
 
6) हरड़ के फल के छोटे - छोटे टुकड़े को चूसें तो काफी हद तक कब्ज से राहत दिलाने में भी यह गुणकारी होता है। इस  को चुटकी भर नमक के साथ खाएं ।
                       अथवा
फिर 1/2 ग्राम की मात्रा में लौंग अथवा दालचीनी के साथ इसका सेवन करें।
 
7) यहाँ तक कि - हरड़ का नियमित रूप से सेवन, वजन कम करने में सहायक है। यह पाचन में सहायक होने के साथ ही, गैस, एसिडिटी और अन्य समस्याओं से राहत देती है और धीरे-धीरे मोटापा कम करती है। 
इन लाभ के अलावा और भी इसके बहुत लाभ हैं। 

*जय माँ शैल पुत्री*

आइए जानें बदलाब तब दिलचस्प हो जाता है-जब बदलाब की दिशा सकारात्मक दिशा हो,स्वयं के जीवन को आकर्षक बनाइये,जीवन मे अपनों का साथ पाइए ।

2 द्वितीय ब्रह्मचारिणी

   "ब्राह्मी"

          "ब्राह्मी" में शरीर की आयु और स्मरण शक्ति को जबरदस्त तरीके से बढ़ाने की क्षमता है।

           नवदुर्गा  की नव शक्तियों में द्वितीय शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ ब्रह्मचारिणी" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार "ब्राह्मी" नामक इस औषधी में शक्ति स्वरूपा ब्रह्मचारिणी की शक्ति स्थायी रूप से विद्दमान होती है।

पहचान (Identifications) :-


        ब्राह्मी बहुत से कंठ रोगों को समाप्त कर कंठ में स्वर को मधुर करने वाली है, इसलिए ब्राह्मी को 'सरस्वती' भी कहा जाता है। जिसका वैज्ञानिक नाम: Bacopa monnieri है।ब्राह्मी तंत्रिका तंत्र को शक्‍ति देती है। ब्राह्मी का पौधा रसीला होता है। ये जमीन पर फैला होता है और इसमें अत्‍यधिक पानी को संग्रहित करने की क्षमता होती है। 
 
       ब्राह्मी में तनाव को कम करने वाले तत्‍व के रूप में बहुत ख्याति प्राप्त है। पिछले 3000 वर्षों से भारतीय पारंपरिक औषधियों में ब्राह्मी का उपयोग किया जा रहा है। भारत के प्राचीन ग्रंथों जिसमें चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में भी इस जड़ी बूटी का उल्‍लेख किया गया है। सुश्रुत संहिता में ब्राह्मी घृत और ब्राह्मी को ऊर्जा प्रदान करने वाली बताया गया है।आयुर्वेद में ब्राह्मी को जीवन रक्षक औषधी के रूप में विशेष स्थान है।

ब्राह्मी के फूल के तीन रंग :-


सफेद, 
गुलाबी ,
नीले ,

गुण (qualities):-


1)यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और पेट की गैस को समाप्त कर मूत्र संबंधी रोगों को नष्ट करने की प्रमुख औषधी है। आयुर्वेदिक उपचार में ब्राह्मी को "मेध्‍यरसायन" का नाम दिया गया है एवं इसका अर्थ है नसों के लिए शक्‍तिवर्द्धक के रूप में कार्य करने वाली तथा पुनर्जीवित करने वाले तत्‍व से युक्‍त।

2)यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी की विशेष आराधना करना चाहिए।

उपयोग :-

1)तीव्र बौद्धिक क्षमता-

        ब्राह्मी की सूखी पत्तियां और बादामगिरी को एक-एक भाग में लेकर एक चौथाई काली मिर्च की मात्रा के साथ पानी में भिगोएं। इनके मुलायम होने पर इन्हें अच्छे से पीसकर मिश्रित कर लें। इसके बाद इनकी 3-3 ग्राम की टिकिया बना लें। 1-1 टिकिया सुबह-शाम दूध के साथ लेने से तीव्र बौद्धिक क्षमता होती है।

2)अनिद्रा (नींद न आना) - 

       ब्राह्मी के 5 ग्रा. चूर्ण को आधा किलो दूध में अच्छी तरह उबालकर व छानकर ठंडा करें। इसे पीने से नींद न आने की पुरानी समस्या में लाभ होगा।

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3)तृतीय चंद्रघंटा

 " चन्दुसूर"

अब होगा मोटापे का नाश यदि होगी यह औषधी "चन्दुसूर" आपके पास।

        नवदुर्गा  की नव शक्तियों में तीसरी शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ चंद्रघंटा" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "चन्दुसूर" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।

पहचान (Identifications) :-

          नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा को औषधीय रूप से विराजमान औषधी को चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है। 

गुण (qualities):-

1)चन्दुसूर औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं।

2)जीवनीय शक्ति को बढ़ाने वाली, 

3)हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है।

अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को माँ चंद्रघंटा की उपासना करना चाहिए।

जल्दी लेख पर पहुंचे :- इस नवरात्री में मां के पास पहुंचने के रहस्य की अनूठी प्रस्तूती - इसे जान लिया तो मन और तन निश्चित ही आराधना में हो जाएंगे संलग्न। आइए शक्ति के साथ हो जाएं,आइए लेख और आप एक हो जाएं ।

4)चतुर्थ कुष्माण्डा 

"पेठा/कुम्हड़ा"

कृमिनाशक के रूप में अचूक औषधी पेठा/कुम्हड़ा के ताजे   बीज हैं ।

           नवदुर्गा  की नव शक्तियों में चोंथी शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को हम "माँ कुष्माण्डा" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "पेठा" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।

पहचान (Identifications) :-


         पेठा औषधी को भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है जिसमें से विशेषकर पेठा / कुष्माण्ड / कुम्हड़ा/winter melon / इत्यादि । पेठा का वानस्पतिक नाम : बेनिनकेसा हिस्पिडा (Benincasa hispida),पेठा एक बेल पर लगने वाला फल है, जो सब्जी की तरह खाया जाता है। यह हल्के हरे वर्ण का होता है और बहुत बड़े आकार का हो सकता है। पूरा पकने पर यह सतही बालों को छोड़कर कुछ श्वेत धूल भरी सतह का हो जाता है।

गुण (qualities):-


1)आयुर्वेद में पेठा का गुण बताया गया है कि यह
 लघु, स्निग्ध, मधुर, शीतवार्य, बात, पित्त, क्षय, अपस्मार, रक्तपित्त और उनमाद नाशक, बलदायक, मूत्रजनक, निद्राकर, तृष्णाशामक और बीज कृमिनाशक आदि कहा गया है।
2) इसके सभी भाग-फल, रस, बीज, त्वक्‌ पत्र, मूल, डंठल-तैल बनाने में विशेष रूप से उपयोगी होते हैं।

कुष्मांड के फलों के खाद्य अंश के विश्लेषण से प्राप्त आंकड़े इस प्रकार हैं।

आर्द्रता 94.8; प्रोटीन 0.5; वसा (ईथर निष्कर्ष) 0.1; कार्बोहाइड्रेट 4.3; खनिज पदार्थ 0.3;कैल्सियम 0.1; फास्फोरस 0.3% लोहा 0.6 मि.ग्रा./,100 ग्र. विटामिन सी, 18 मिग्रा. या 100 ग्रा.।

उपयोग :- 

1)इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। 
2)इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। 
3)मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। 
4)यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है।
5) कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। 
इस तरह की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।
6)इसके मुरब्बे, पाक, अवलेह, ठंढाई, घृत आदि बनते हैं। इसके फल में जल के अतिरिक्त स्टार्च, क्षार तत्व, प्रोटीन, मायोसीन शर्करा, तिक्त राल आदि रहते हैं।
7)कुम्हड़ा के बीजों का उपयोग खाद्य पदार्थों के रूप में किया जाता है। 

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5) पंचम स्कंदमाता

 "अलसी"

             नवदुर्गा  की नव शक्तियों में पांचवी शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ स्कंदमाता" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "अलसी" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।

पहचान (Identifications) :-

          अनेक शारीरिक समस्याओं में अत्यंत ही महत्वपूर्ण औषधी में से एक है "अलसी",अलसी का बोटेनिकल नाम है- लाइनम यूजीटेटीसिमम (Linum usitatissimum) है,भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही अलसी के सेवन पर बल दिया जाता रहा है। पूर्व में इसका प्रयोग कपड़ों, रंग और वार्निश के निर्माण में भी होता था।इसका बीज छोटा, सुनहरा व चिकना होता है।
अलसी भारतवर्ष में भी पैदा होती है।इसके पौधे दो या ढाई फुट ऊँचे, डालियां बंधती हैं, जिनमें बीज रहता है। इन बीजों से तेल निकलता है, जिसमें यह गुण होता है कि वायु के संपर्क में रहने के कुछ समय में यह ठोस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है।

गुण(qualities):-

सँस्कृत के एक  श्लोक में  कहा गया है कि -

 "अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
        अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।"

कफ,पित्त इत्यादि के  रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।

            आयुर्वेद में इसके गुणों के बारे में बताया गया है कि अलसी को 1)मंद सुगंधयुक्त, 2)मधुर, 3)बल कारक, 4)किंचित 4)कफवात-कारक, 5)पित्त नाशक, 6)स्निग्ध, 7)पचने में भारी, 8)गरम, 9)पौष्टिक, 10)कामोद्दीपक, 11)पीठ के दर्द ओर सूजन को मिटानेवाली कहा गया है। 

अलसी की तीन उपजातियाँ होतीं हैं-

लाल,
श्वेत तथा 
धूसर रंग 

उपयोग :-

1) गरम पानी में डालकर केवल बीजों का या इसके साथ एक तिहाई भाग मुलेठी का चूर्ण मिलाकर, क्वाथ (काढ़ा) बनाया जाता है, जो रक्त अतिसार और मूत्र संबंधी रोगों में उपयोगी कहा गया है।

2)अलसी को धीमी आँच पर हल्का भून लें। फिर मिक्सर में पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भरकर रख लें। रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच पावडर पानी के साथ लें। इसे अधिक मात्रा में पीस कर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि यह खराब होने लगती है। इसलिए थोड़ा-थोड़ा ही पीस कर रखें। 
हमेशा ध्यान रखें,अलसी सेवन के दौरान पानी खूब पीना चाहिए। इसमें फायबर अधिक होता है, जो पानी ज्यादा माँगता है।

3)हमें प्रतिदिन 30 से 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये,30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये । मधुमेह के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें।

4)इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं। जो शरीर के लिए पोषक हैं।

5)अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है।

6)पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।

7)सावधान - अलसी के साबुत बीज कई बार हमारे शरीर से पचे बिना निकल जाते हैं इसलिए इन्हें पीसकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। 20 ग्राम (1 टेबलस्पून) अलसी पाउडर को सुबह खाली पेट हल्के गर्म पानी के साथ लेने से शुरुआत करें। आप इसे फल या सब्जियों के ताजे जूस में मिला सकते हैं, या तो आप,अपने भोजन में ऊपर से बुरक कर भी खा सकते हैं।

8)हमेशा ध्यान रखिये कि - दिन भर में 2 टेबलस्पून (40 ग्राम) से ज्यादा अलसी का सेवन न करें।

9)साबुत अलसी लंबे समय तक खराब नहीं होती लेकिन इसका पाउडर हवा में मौजूद ऑक्सीजन के प्रभाव में खराब हो जाता है, इसलिए ज़रूरत के मुताबिक अलसी को ताज़ा पीसकर ही इस्तेमाल करें। इसे अधिक मात्रा में पीसकर न रखें। 

बहुत ज्यादा सेंकने या फ्राई करने से अलसी के औषधीय गुण नष्ट हो सकते हैं और इसका स्वाद बिगड़ सकता है।

10)विशेष सुझाव है कि कभी-कभी,अलसी खाने से कुछ लोगों को शुरुआत में कब्ज हो सकती है। ऐसा होने पर पानी ज्यादा पिएं। अलसी खून को पतला करती है इसलिए यदि आपको ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो इसके सेवन से पहले डॉक्टर से परामर्श कर लें।

11) अलसी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर हालांकि कोई बड़ी रिसर्च नहीं हुई है। लेकिन पारंपरिक ज्ञान में Flax seed को बहुत गुणकारी माना गया है। इसके उपयोग से कोलेस्ट्रॉल के लेवल में कमी आना देखा गया है।
इत्यादी अन्य लाभ भी हैं।

तेल तड़का छोड़ कर, नित घूमन को जाय।
                 मधुमेह का नाश हो, जो जन अलसी खाय।।
नित भोजन के संग में, मुट्ठी अलसी खाय।
             अपच मिटे, भोजन पचे, कब्जियत मिट जाये।।
घी खाये मांस बढ़े, अलसी खाये खोपड़ी।
                दूध पिये शक्ति बढ़े, भुला दे सबकी हेकड़ी।।
धातुवर्धक, बल-कारक, जो प्रिय पूछो मोय।
           अलसी समान त्रिलोक में, और न औषध कोय।।
जो नित अलसी खात है, प्रातः पियत है पानी।
            कबहुं न मिलिहैं वैद्यराज से, 
                                           कबहुँ न जाई जवानी।।
अलसी तोला तीन जो, दूध मिला कर खाय।
                       रक्त धातु दोनों बढ़े, नामर्दी मिट जाय।।


6)षष्ठम कात्यायनी

 "मोइया"

           नवदुर्गा  की नव शक्तियों में षष्ठम शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ कात्यायनी" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "मोइया" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।

पहचान (Identifications) :-

            नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। 

उपयोग /गुण/सेवन विधि :-

              मोइया नामक इस औषधी में कफ,पित्त से उतपन्न विकार एवं कंठ के रोग का नाश करने का गुण है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए।


7)सप्तम कालरात्रि 

"नागदौन"

              नवदुर्गा  की नव शक्तियों में सप्तम शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ कालरात्री" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "नागदौन" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।
माँ दुर्गा का यह सप्तम रूप कालरात्री है जिसे महायोगिनी व महायोगीश्वरी कहा गया है।

पहचान (Identifications) :-

               नागदौन का वैज्ञानिक नाम: Artemisia absinthium है,इसके जड के ऊपर से ग्वारपाठे की सी पत्तियाँ चारों ओर निकलती हैं |नागदमनी के पत्ते गहरे हरे रंग के, 3-4 इंच लंबाई वाले, तदनुसार चौड़ाई भी थोड़ी ही- ऊर्ध्वमुखी शाखाओं पर अल्प संख्या में ही होते हैं।
               नागदमनी के कभी फूल या फल नहीं आते, इसकी डंडी या पत्ता तोड़ें तो दूध जैसे द्रव का स्राव होता है,नागदौने की जड कंद के रूप में नीचे की ओर जाती है। 
               यह कम जल और किसी भी वातावरण में जीवित रहने वाला नागदमनी के डंठल को तोड़-काट कर भी आसानी से लगाया जा सकता है ।

गुण(qualities):-

1) यह सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली ओषधी है।
2)यह मन व मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधी है। 
3)इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। 
4)यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधी है।

इस कालरात्रि की आराधना उक्त विकारों से पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

उपयोग :-

1)मन्दबुद्धि बालकों को साधित नामदमनी मूल को भद्रादि रहित किसी रविवार या मंगलवार को ताबीज में भर कर लाल धागे में पिरोकर गले या बांह में बांध देने से अद्भुत लाभ होता है। सामान्य बालकों के बौद्धिक विकास हेतु भी यह प्रयोग किया जा सकता है।

2)बवासीर में नागदोन का प्रयोग बहुत लाभकारी। इसके लिये नागदोन के 1 से 3 पत्ते व 1 से 2 कालीमिर्च को पीसकर रस निकल लें,उसमे से एक चम्मच रस को सुबह खाली पेट पियें,लाभ होगा |
3)मासिक रक्तस्राव अधिक हो तब भी यह प्रयोग किया जा सकता है| इसके तीन छोटे पत्ते काली मिर्च के साथ पांच दिन तक खा लें या फिर एक चम्मच रस सवेरे खाली पेट लें|
4)नागदमनी का चूर्ण खाने से लाभ होता है या उनका रस काली मिर्च के साथ खाली पेट लें |

8)अष्टम महागौरी 

"तुलसी"

                माँ नवदुर्गा  की नव शक्तियों में अष्टम शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ महागौरी" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "तुलसी" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।

पहचान (Identifications) :-

                 "तुलसी" को प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है इस 'तुलसी' नामक औषधी को अपने घर में लगाने से वास्तु दोष में राहत मिलती है। व घर से बाहर लगाने पर नकारात्मक ऊर्जा का  घर मे प्रवेश नहीं होता है। इसलिए सबसे ज्यादा कीमती वे लोग हैं जो नियमित तुलसी को जल चढ़ाकर उसके सामने दिया रखते हैं।
                   इनमें ऑसीमम सैक्टम को प्रधान या पवित्र तुलसी माना गया जाता है। इसकी भी दो प्रधान प्रजातियाँ हैं- श्री तुलसी जिसकी पत्तियाँ हरी होती हैं तथा कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियाँ कुछ बैंगनी रंग लिए होती हैं। श्री तुलसी के पत्र तथा शाखाएँ श्वेताभ होते हैं जबकि कृष्ण तुलसी के पत्रादि कृष्ण रंग के होते हैं। 
गुण, धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को ही श्रेष्ठ माना गया है।

तुलसी के प्रकार -

तुलसी सात प्रकार की होती है- 

1)सफेद तुलसी,
2) काली तुलसी, 
3)मरुता,
4) दवना, 
5)कुढेरक, 
6)अर्जक 
7)षटपत्र।
 

नव शक्ति का औषधीय रहस्य |usefull medicion in ayurved

ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।


एक श्लोक में कहा गया है कि
"तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि: 
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।"

इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।

तुलसी की प्रजातियाँ पाई जाती हैं-


1) ऑसीमम अमेरिकन (काली तुलसी) गम्भीरा या मामरी।
2)ऑसीमम वेसिलिकम (मरुआ तुलसी) मुन्जरिकी या मुरसा।
3)ऑसीमम वेसिलिकम मिनिमम।
4) आसीमम ग्रेटिसिकम (राम तुलसी / वन तुलसी / अरण्यतुलसी)।
5)ऑसीमम किलिमण्डचेरिकम (कर्पूर तुलसी)।
6)ऑसीमम सैक्टम
7) ऑसीमम विरिडी।

उपयोग :-

1)यदि कहीं चोट लग जाती है तो तुलसी के पत्ते को फिटकरी के साथ मिलाकर लगाने से घाव तुरंत ठीक हो जाता है। तुलसी में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल तत्व घाव को पकने नहीं देता है। इसके पत्ते को तेल में मिलाकर लगाने से जलन भी कम होती है।
2)ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है।
3)आयुर्वेद में तो तुलसी को उसके औषधीय गुणों के कारण विशेष महत्व दिया गया है। तुलसी ऐसी औषधि है जो ज्यादातर बीमारियों में काम आती है। इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, खॉसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए बहुत ही फायदेमंद माना जाता है।
4)सुंदरता से भरे हुए चेहरे की चमक में उपयोगी होती है "तुलसी" । "तुलसी" त्वचा संबंधी बीमारियों के लिए फायदेमंद है। इसका इस्तेमाल करने से चेहरे पर कील-मुहांसे खत्म हो जाते हैं और चेहरा एकदम साफ हो जाता है।
5)तुलसी सर्दी-जुकाम के साथ बुखार में भी फायदा पहुंचाती है। काली मिर्च और तुलसी को पानी में उबाल कर काढ़ा बनाएं, इसमें मिश्री डालें। हर आधा-आधा घण्टे में 3 से चार बार इसको पीने से बुखार में राहत मिलती है। 
6)जुकाम होने पर तुलसी को पानी में उबाल कर भाप लेने से भी फायदा होता है।
7)तुलसी पेट संबंधित परेशानियों में भी लाभ पहुंचाती है। लूज मोशन होने पर तुलसी को जीरे के साथ पीस लें और दिन में तीन से चार बार इस मिश्रण को खाएं। इससे दस्त की समस्या समाप्त होती है।

9)नवम सिद्धिदात्री 

 "शतावरी"

शतावरी बुद्धि,बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है।
             नवदुर्गा की नव शक्तियों में नवम शक्ति के रूप में इस अखिल ब्रम्हाण्ड की शक्ति को "माँ सिद्धिदात्री" के नाम से हम जानते हैं। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार यह शक्ति "शतावरी" नामक औषधी में स्थायी रूप से विद्दमान रहती है।

पहचान (Identifications) :-

               शतावरी को 'शतावर', 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल' और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत,श्री लंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है।शतावरी का वैज्ञानिक नाम: Asparagus racemosus है।
                यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है।

गुण(qulities):-

               शतावरी में विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई, विटामिन के, विटामिन बी 6, फोलेट, आयरन, कैल्शियम, फाइबर और प्रोटीन भरपूर मात्रा में होते हैं।

"आयुर्वेद की रानी के रूप में हम "शतावरी" को जानते हैं।"

जिसमें गुणों की भरमार है,जिसके गुणों में छुपे हैं खास राज जो इस प्रकार हैं:-
1)गर्भाशाय में शतावरी के बहुत उपयोगी हैं । 
2)शतावरी क‍िडनी (Kidney Health)  के लि‍ए भी फायदेमंद है। शतावरी मूत्र विसर्जनं के समय होने वाली जलन को कम करने का गुण बड़ा ही उपयोगी है।
3)UTI Remedies,के लि‍ए शतावरी अच्छी मानी जाती है।
4) इसके अलावा शतावरी का इस्‍तेमाल है,Hangover को दूर करने में भी किया जाता  है।
5)सतावर का एक ऐंसा गुण है जिससे दर्द कम करने में सहायता मिलती है। 
6)महिलाओं में स्तन्य (दूध) की मात्रा बढ़ाने का यह गुण सतावर में अद्भुत है।
7)सतावर के पौधे का एक गुण ऐंसा है जिससे कि कम भूख लगने व अनिद्रा की बीमारी में भी लाभ होता  है।

"शतावरी" स्त्रियों के लिए यह एक जबरदस्त टॉनिक माना जाता है।

उपयोग :-

1)बहुत से लोगों को नींद ना आने का रोग होता है। ऐसे लोग 2-4 ग्राम शतावरी चूर्ण को दूध में पका लें। इसमें घी मिलाकर खाने से नींद ना आने की परेशानी खत्म होती है। कहने का मतलब यह है कि शतावर चूर्ण अनिद्रा की बीमारी में बहुत ही लाभकारी हैं।
2) बहुत सी स्त्रियों को मां बनने के बाद स्तनों में दूध की कमी का रोग होता है। ऐसी स्थिति में महिलाएं 10 ग्राम शतावरी के जड़ के चूर्ण (shatavari powder) को दूध के साथ सेवन करें। इससे स्तनों में दूध की वृद्धि होती है। इसलिए डिलीवरी के बाद भी शतावरी के फायदे महिलाओं को मिलना उनके सेहत के लिए अच्छा होता है।
3)यदि भोजन ठीक से नहीं पच रहा है, तो निश्चित ही शतावरी का उपयोग (satawar ke fayde)करना लाभ पहुंचाता है। 5 मिली शतावर के जड़ के रस को मधु,और दूध के साथ मिला लें। इसे पिलाने से अपच जैसी परेशानी से शान्ति मिलती है।
4)शतावरी सिर दर्द से भी आराम दिलाता है। शतावर की ताजी जड़ को कूटकर, रस निकाल लें। इसमें रस के बराबर ही तिल का तेल डालकर उबाल लें। इस तेल से सिर पर मालिश करें। इससे सिर दर्द, और अधकपारी (आधासीसी) में आराम मिलता है।
इत्यादि शतावरी के बहुत से प्रयोग हैं ।
            इन सभी रोगों से पीड़ित रोगी यदि चाहे की उसे रोग मुक्त होना है तो उसे शतावरी का उचित अनुपात में सेवन के साथ साथ उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर करने के लिए सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए।
            आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धती के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए । इस प्रकार प्रत्येक शक्ति के रहस्य में जिन औषधीयों में वे उपस्थित हैं उनको समझ लिया जाए,सेवन विधि और उचित अनुपात में परिचित हो जाये तो निश्चित ही वह लंबे समय तक निरोगी रह सकता है।

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