जिज्ञासा और अभीप्सा का रहस्य(The mystery of curiosity and longing)

जिज्ञासा और अभीप्सा का रहस्य(The mystery of curiosity and longing)

जिज्ञासा और अभीप्सा का रहस्य(The mystery of curiosity and longing)

           जीवन को जीना है तो ऊपर ऊपर न जीकर गहराई से जीना होता है सफलता इसी पर आधारित होती है,अनुभवः इसी पर आधारित होता है कि जीवन के महत्वपूर्ण पल जब सामने आपके गुजर रहे थे - तब उन पलों के शामिल होने की आपकी जिज्ञासा ही थी या आप अभीप्सा से उस पल को पकड़कर जबरदस्त छलांग लगा गये और आज आप सरलता से सफल,अनुभवी,गहन चिंतक हैं । किसी भी क्षेत्र में यदि सफलता के चरमोत्कर्ष तक पहुंचना है तो हमेशा ही जिज्ञासा और अभीप्सा के रहस्य(The mystery of curiosity and longing) की आवश्यकता होगी,बिना इनके रहस्य के आप आगे सफलता की सीडी तक नहीं पहुंच पाएंगे - हो जाइये तैयार अब जीवन बदलने हेतु प्रस्तूत है-

जिज्ञासा (curiosity)

           जिज्ञासा (curiosity)से तात्पर्य है :- जो क्षणभंगुर है,औपचारिक है। उठी और गई जब तक हम पूछते हैं तब तक ही समाप्त होने लगती है। जिज्ञासा बचकानी हरकत है। अत्यंत ही कुतूहल से भरी है ।

अभीप्सा (longing)

            अभीप्सा (longing) से तात्पर्य है 'एक गहरी प्यास'। और ऐसी प्यास कि प्राण संकट में हों, जैसे कोई आदमी रेगिस्तान में भटक जाए और पानी न मिले कई दिनों तक, तो क्या वह पूछेगा पानी क्या है? क्या वह पूछेगा कि पानी का वैज्ञानिक सूत्र क्या है? अगर आप समझाओगे भी उस व्यक्ति को, कि घबड़ा मत, पानी में क्या रखा है, H2O, उद्भजन और आक्सीजन दो गैस के मिलने से पानी बनता है। तो वह कहेगा कि महानुभव, मुझे क्षमा करें, मुझे न आक्सीजन से कोई प्रयोजन है, न उद्भजन से कुछ प्रयोजन है, मुझे तो केवल पानी ही दिखता है क्योंकि मुझे प्यास लगी है।

             आप जानतें हैं जैसे कोई मरुस्थल में प्यास लगे तो रोआं-रोआं प्यास से भर ही जायेगा । वह कुछ मिनट-दो मिनट में भूल थोड़े ही जाएगा, घड़ी-दो घड़ी में भूल थोड़े ही जाएगा। जितना समय बीतेगा उतनी प्यास गहरी होने लगेगी, उतने प्राणों में छेदन होंने लगेंगे।

शब्दों का खेल, हिंदी और संस्कृत के शब्दों में छुपा है जादू आइए इन शब्दों की कैसे गहराई से प्रस्तूति को जाने पढ़ें,और पढायें । 

यदि किसी भी विषय या क्षेत्र में सफल होंना है तो

               सफलता की शुरुवात अभीप्सा से, हमेशा ही अनिवार्य रही है - यदि अभीप्सा है तो चाहे परमात्मा को पाना हो या किसी अत्यंत आवश्यक कार्य में सरलता से सफलता प्राप्त करना अत्यंत ही सरल और कुछ नहीं है। और जिज्ञासा हो तो परमात्मा को पाने से ज्यादा अथवा किसी अत्यंत आवश्यक कार्य में सरलता से सफलता प्राप्त करना अत्यंत ही कठिन और कुछ भी नहीं।

                जिज्ञासा कुछ कुछ बच्चों की चेष्टा जैसी  है। लेना-देना कुछ नहीं बस अचानक पूछ ही लिया । अच्छे-अच्छे प्रश्न लोग पूछने के आदी हो जाते हैं। ऐसा लगता है, अच्छे प्रश्न पूछे तो सिद्ध होता है हम श्रेष्ठ आदमी हैं। अरे वाह , कैसा गजब का प्रश्न पूछा मैंने ! परमात्मा कहां है, कौन है, क्या है? दार्शनिक प्रश्न पूछा, तात्विक प्रश्न पूछा - लेकिन क्या यह प्यास है, अभीप्सा है? अगर मैं कहती हूँ कि जो कार्य आप कर रहे हैं उसमें आसानी से आप सफल हो सकते हैं परन्तु सब कुछ छोड़ कर मेरी शर्त अनुसार उस कार्य में ही लगना होगा, सफल हो जाएंगे निश्चय हो जाने के बाद भी आप लगभग 80 प्रतिशत सम्भव है कि ऐंसा जरूर कहेंगे कि - थोड़ा रुकिए जरा पति से पूछना पड़ेगा। जरा पत्नी से पूंछ लूं । अभी तो छोटे बाल-बच्चे हैं, अभी इनकी देखभाल करनी है, फिर कभी देखेंगे । डूबने की कोई तैयारी ही नहीं है। क्यों कि डूबना हम चाहते ही नहीं । किसी कार्य की सफलता उस अभीप्सा पर आधारित है कि कितना मन को गहराई में लेकर आपने किया,और वह आपकी कितनी गहरी प्यास बना।

             लेकिन जिज्ञासा ऊपर का दिखावा मात्र है।करना कुछ नहीं केवल पूंछ लिया जो कि सर्वथा गलत ही साबित हमेशा से ही होती है। इसलिए अभीप्सा जरूरी है,जिज्ञासा नहीं।

जो जिज्ञासा और अभीप्सा का रहस्य(The mystery of curiosity and longing)को समझ गया वह सफल होता ही है।

एक दिलचस्प रहस्य कैसे छुपा है इन शब्दों में  जल्दी पढ़िये और जीवन मे ये शब्द अत्यंत की काम के हैं । तो आइए इन शब्दों को आत्मसाद करें ।

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