सत्संग का रहस्य | How does satsang happen

 सत्संग

क्या होता है सत्संग में | How does satsang happen

सत्संग का रहस्य | How does satsang happen

              हमारे जीवन मे एक ऐंसे व्यक्तित्व से परिचय होता है जिसने स्वयं में उतर कर स्वयम को जान लिया हो, उसके पास बैठ कर स्‍वाद फैलता हो । जिसने जान लिया हो, उसकी तरंगों में डुबकर भीतर की सोई हुई हमारी विस्‍मृत तरंगें सक्रिय होने लगती है, कंपन आने लगता है। सत्‍संग का इतना ही अर्थ है कि जो भी जीवन की गहराइयों में आपसे आगे जा चुका हो, उसे आगे, गया हुआ देखकर आपके भीतर चुनौती उठती है: कि किसी भी हालत में आपको भी वही गहराई में उतरना है। रूकना फिर मुश्‍किल हो जाता है।

सत्संग का अर्थ

           सत्‍संग का अर्थ हमारे मार्गदर्शक के वचन सुनने से उतना नही है। जितनी उसकी गहराई की मौजूदगी के एहसाह से है, जितना मार्गदर्शक की सकारात्मक ऊर्जा को अपने भीतर आने देने से है, जितना मार्गदर्शक के साथ एक लय में बद्ध हो जाने से है।

सत्संग में क्या होता है

      मार्गदर्शक एक विशिष्‍ट तरंग में जी रहा है। आप जब मार्गदर्शक के पास होते हो तब उसकी तरंगें, आपके भीतर भी वैसी ही तरंगों को पैदा करती है। 

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वेश्या रूपी मार्गदर्शक के सत्संग से बदला स्वामी विवेकानंद का जीवन

         एक समय की बात है जब विवेकानंद अमरीका जाने से पहले और संसार-प्रसिद्ध व्‍यक्‍ति बनने से पहले, जयपुर के महाराजा के महल में ठहरे थे। वे महाराज भक्‍त थे, विवेकानंद जी के और रामकृष्‍ण जी के । जैसे कि महाराज करते है, जब विवेकानंद उसके महल में ठहरने आये,उसने इसी बात पर बड़ा उत्‍सव आयोजित कर दिया।

          इस महत्वपूर्ण वेला को यादगार बनाने के लिए,महाराज ने स्‍वागत उत्‍सव पर नाचने ओर गाने के लिए वेश्‍याओं को भी बुला लिया। उस समय जैसे राजाओं और महा राजाओं का चलन हुआ करता था । उनके अपने ढंग के मन हुआ करते थे। लेकिन कुछ क्षण के बाद वह बिलकुल भूल ही गया कि नाचने-गाने वाली वेश्‍याओं को लेकर संन्‍यासी का स्‍वागत करना उपयुक्‍त नहीं है। महाराजा की एक मजबूरी भी थी कि वह कोई और ढंग भी जानता नहीं था। उसने हमेशा से यही किया था कि जब किसी का स्‍वागत करना हो तो, शराब, नाच, गाना, यही सब चलता था।

        ऐंसा लगता है कि  विवेकानंद निश्चित ही इस समय उतने परिपक्‍व नहीं हुए थे। वे अब तक पूरे संन्‍यासी न हुए थे। यदि वे पूरे संन्‍यासी होते, यदि तटस्‍थता बनी रहती तो, फिर कोई समस्‍या ही न रहती। लेकिन वे अभी भी तटस्‍थ नहीं थे। वे अब तक उतने गहरे नहीं उतरे थे,जैसे पतंजलि। निश्चित ही वे युवा थे। और बहुत दमनात्‍मक व्‍यक्‍ति थे। अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो बस उन्‍होंने अपना कमरा बंद कर लिया। और बाहर आते ही न थे। महाराजा भी आये और प्रार्थना की उन्होने विवेकानन्द से  क्षमा चाही ।

        महाराजा विवेकानन्द के पास गए हाथ जोड़कर वे बोले, हम जानते ही न थे। इससे पहले हमने किसी संन्‍यासी के लिए उत्‍सव आयोजित ही नहीं किया था। हम हमेशा राजाओं का अतिथि-सत्‍कार करते आयें है। इसलिए हमें राजाओं के ढंग ही मालूम है। राजा निराश भरे शब्दों से बोला हमें अफसोस है, पर अब तो यह बहुत अपमानजनक बात हो जायेगी। क्‍योंकि यह इस देश की सबसे बड़ी वेश्‍या है। और बहुत महंगी है। और हमने इस कार्यक्रम में आने के लिए इसको रूपया दे दिया है। उसे यहां से हटने को और चले जाने को कहना तो उसके लिए अपमानजनक होगा। और विनम्र भाव मे आकर महाराजा ने कहा कि अगर आप नहीं आते तो वह बहुत ज्‍यादा चोट महसूस करेगी। इसलिए कृपा कर बाहर जरूर आयें। 

        किंतु विवेकानंद भयभीत थे,बाहर आने में। इसलिए ये  पक्‍के संन्‍यासी नहीं हुए थे। अभी भी तटस्‍थता मौजूद थी। मात्र निंदा थी। एक वेश्‍या? वे बहुत क्रोध में थे, और वे बोले,नहीं,चुप ही रहे किसी भी प्रकार का संकेत नहीं किया। वेश्या भी पूर्ण उत्साह में थी कि वे एक सन्त से जो मिलने जा रही है। लेकिन जब उसकी आंखें उस सन्त को नहीं देख पायीं , तो फिर  फिर वेश्‍या ने गाना शुरू कर दिया। विवेकानन्द के आये बिना। और उसने कभी बचपन में सीख रखा था वह गीत गाया। एक संन्‍यासी का गीत जो बड़ा ही अद्भुत था । गीत बहुत सुंदर था। 

         वह अति महत्वपूर्ण गीत यह कहता है कि मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही; यह मालूम है मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?

           कहते है, विवेकानंद ने अपने कमरे में सुना पूरी तल्लीनता से इस गीत का रसस्वादन किया। वह वेश्‍या रो रही थी। और रो-रो कर गा रही थी। और उन्‍होंने अपने अन्तः में अनुभव किया-उस पूरी स्‍थिति का। 

           अब विवेकानन्द का रोमां - रोमां कॉप उठा,हिल उठे विवेकानन्द उन्‍होंने तब अपनी और देखा कि वे क्‍या कर रहे है? बात अप्रौढ़ थी, बहुत बचकानी थी। क्‍यों हों रहे वे भयभीत? यदि आप आकर्षित होते हो तो ही भय होता है। आप केवल तभी स्‍त्री से भयभीत होओगे, यदि आप स्‍त्री के आकर्षण में बंधे हो। यदि आप आकर्षित नहीं हो तो भय निश्चित ही तिरोहित हो जाता है। भय है क्‍या? तटस्थता आती है बिना किसी विरोधात्‍मकता के।

          अब तो विवेकानन्द जी को मिल गया मार्गदर्शक, घट गया सत्संग,जो रामकृष्ण न कर पाए वह एक वेश्या ने कर दिखाया,और विवेकानन्द जी स्‍वयं को रोक न सके, इसलिए उन्‍होंने खोल दिये थे,खुद के कमरे के द्वार,अब वे पराजित हो ही चुके एक वेश्‍या से। वेश्‍या विजयी हुई थी। विवेकानन्द को बाहर आना ही पडा। वे आये और झुक गए मार्गदर्शक के चरणों में और क्षमा मांगी और नृत्‍य देखने के लिए उचित स्थान पर बैठ गये। बाद में उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ईश्‍वर द्वारा एक नया प्रकाश दिया गया है मुझे। भयभीत था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी मेरे भीतर। इसीलिए भयभीत हुआ मैं। किंतु उस स्‍त्री ने मुझे पूरी तरह से पराजित कर दिया था। और मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा। 

          आगे विवेकानन्द लिखते हैं कि वे अश्रु इतने निर्दोष थे। और वह नृत्‍य गान इतना पावन था बच गया नहीं तो यह पवित्र मोंका मैं चूक गया होता। और उसके समीप बैठे हुए, पहली बार मैं सजग हो आया था। कि बात उसकी नहीं है जो बाहर होता है। महत्‍व इस बात का है जो हमारे भीतर होता है। वे वासना के पार जा चूके थे। उस वेश्‍या ने उन्‍हें मदद दी पार जाने में। यह एक अद्भुत घटना थी। रामकृष्‍ण न कर सके मदद, लेकिन एक वेश्‍या ने कर दी मदद। अत: कोई नहीं जानता कहां से आयेगी। कोई नहीं जानता क्‍या है बुरा? और क्‍या है अच्‍छा? कौन कर सकता है निश्‍चित? मन दुर्बल है और असहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण तय मत कर लेना। यही है अर्थ तटस्‍थ होने का।

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''सत्संग की महिमा" | importance of satsang

गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार

बिनु सत्संग बिवेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।

अबमोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरिकृपा मिलहि नहि संता ।

               मनुष्य के जीवन मे अशांति, परेशानियां तब शुरु हो जाती है जब मनुष्य के जीवन मे सत्संग नही होता। संतो के संग से मिलने वाला आनंद तो बैकुण्ठ मे भी सुलभ नही है ।।

आगे तुलसी दास जी कहते हैं कि -

एक घडी आधी घडी आधिहु मे पुनि आधि ।

तुलसी संगति साधु की हरहि कोटि अपराध ।।

रामचरितमानस मे भी लिखा है कि :-

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरि तुला एक अंग। 

तुल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।

          तात्पर्य यह है कि हे तात। स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाये ते भी वे सब सुख मिलकर भी दूसरे पलड़े में रखे हुए उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण मात्र के सत्संग से मिलता है।’

         सत्संग की बहुत महिमा है, सत्संग तो वो दर्पण है जो मनुष्य के चरित्र को दिखाता है ओर साथ साथ चरित्र को सुधारता भी है।

        सत्संग से मनुष्य को जीवन जीने का तरीका पता चलता है, सत्संग से ही मनुष्य को अपने वास्तविक कर्तव्य का पता चलता है।

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मानस मे लिखा है की:- 

सतसंगत मुद मंगल मुला, सोई फल सिधि सब साधन फूला…

            इसका तात्पर्य यह हुआ कि :- सत्संग सब मङ्गलो का मूल है, जैसे फूल से फल ओर फल से बीज ओर बीज से वृक्ष होता है उसी प्रकार सत्संग से विवेक जागृत होता है ओर विवेक जागृत होने के बाद भगवान से प्रेम होता है ओर प्रेम से प्रभु प्राप्ति होती है।

जिन्ह प्रेम किया तिन्ही प्रभु पाया…

           सत्संग से मनुष्य के करोडों करोडों पूर्व के जन्मो के संचित कर्म से बनी ऊर्जा जो पतन की तरफ हमे ले जा रही है वह सब समाप्त हो जाती है,सत्संग से मनुष्य का मन बुद्धि शुद्ध होती है, सत्संग से ही भक्ति मजबूत होती है।

भक्ति सुतंत्र सकल सुखखानि,बिनु सत्संग न पावहि प्राणी…

          ब्रम्हाण्डीय ऊर्जा की जब कृपा होती है तब मनुष्य को सत्संग ओर संतो का संग प्राप्त होता है…

सत्संग मे बतायी जाने वाली बातो को जीवन मे धारण करने पर भी आनंद की प्राप्ति ओर दैवीय शक्ति से प्रीति होती है.

जीवन से सत्संग को अलग नही करना चाहिये। जब सत्संग जीवन मे नही रहेगा तो संसार के प्रति आकर्षण बढेगा I

         सत्संग बहुत दुर्लभ है ओर जिसे सत्संग मिलता है उसपर विशेष कृपा होती है ब्रम्हाण्डीय ऊर्जा की ।

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एक सत्संग ने दस्यु रत्नाकर को महर्षि वाल्मीकि बना दिया।


         देवर्षि नारद ने वाल्मीकि से कहा- 'महर्षि महापुरुषों का संग दुर्लभ है। इस सूत्र की व्याख्या आपके मुख से सुनकर हम सभी अनुगृहीत होंगे।' वाल्मीकि मुस्कराए और कहने लगे-'देवर्षि आपके संग ने मुझे अनुगृहीत किया। आज का महर्षि वाल्मीकि कभी दस्यु रत्नाकर हुआ करता था। इस अपकर्म को करते हुए जीवन के कितने ही वर्ष निकल गए। तभी भगवान की कृपा से आपके दर्शन हुए। मैं हतभाग्य पहचान न सका।

       मैंने आपको डराया, धमकाया यहां तक कि आपको एक वृक्ष से बांधा, किंतु आपको तनिक भी क्रोध नहीं आया। आपने बस इतना ही कहा-'तुम यह सब क्यों करते हो?' मैंने कहा-'अपने परिवार के पोषण के लिए।' तब आपने मुझसे कहा था- 'क्या तुम्हारे परिवार के लोग भी इस कर्मफल के भागीदार होंगे?' मैंने सहज ही कह दिया- 'अवश्य।' तब आपने मुझसे कहा था, 'ऐसे नहीं। उन लोगों से पूछ कर उत्तर दो।' मैंने आपको एक वृक्ष से बांधा और उनसे उत्तर पूछने गया। उनके उत्तर से मुझे हैरानी हुई, क्योंकि सभी ने एक स्वर से मना करते हुए कहा, 'अपने कर्मफल का भोग तुम्हें स्वयं करना है।' मैं भागा-भागा आपकी शरण में आया।

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       आपने मुझे राम नाम जपने का आदेश दिया, किंतु मैं अभागा, मुझे राम कहना ही न आया। पूर्व दस्युकर्म ने मुझे 'मरा' कहना अवश्य सिखाया था। तब आपने कहा था-'कोई बात नहीं, तुम यही जपो।' मर्यादा पुरुषोत्तम का यह नाम मेरे लिए अमोघ अस्त्र बन गया। 'मरा' नाम राम के रूप में कब परिवर्तित हुआ पता ही न लगा। भूख-प्यास, सर्दी-गरमी से बेखबर मैं रामनाम जपता रहा। हताश, निराशा के बवंडर आए, किंतु आप मुझे हर बार धीरज बंधाते रहे। मुझे वह क्षण भी नहीं भूला है जब मैं तमसा निर्जन तट पर खड़ा था और कौंच-वध देखकर मेरे मुख से अनायास एक छंद विस्मृत हो गया। मेरे मुख से वह अनुष्टुप उच्चरित होते ही आप प्रकट हुए थे और कहा था-'तुम्हारी जिभ्या पर सरस्वती अवतरित हुई हैं, आज से तुम आदिकवि कहलाओगे।' देवर्षि यह है सत्संग का प्रभाव जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं हूं।


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