बदलाब की शुरूवात,सकारात्मकता के साथ(Change started,with positivity)

बदलाब की शुरूवात,सकारात्मकता के साथ(Change started,with positivity)

Life change movement

             यह एक कड़वा सच है कि हम अपना मूल्यवान समय दूसरों को सुधारने में गवाँ देते हैं,स्वयं को प्रकाशवान बनाने के लिए बदलाब की शुरूवात,सकारात्मकता के साथ(Change started,with positivity) होनी चाहिए, विचार और सिद्धांतों की अनेकता में गोता लगाते-लगाते स्वयं को देखें कहीं हम डूब तो नहीं रहे हैं,क्योंकि चलायमान जीवन मे प्रत्येक पहलुओं में,तैरते आना चाहिए। हर व्यक्ति स्वयं को बदलने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे तो दूसरों कि कमियों में ध्यान ही नहीं जाएगा। न किसी को गिराने की सुद रहेगी,न किसी को बिखराने की चारों तरफ यही गुंजाय मान होगा। "स्वयं को बदलें,स्वयं को बदलें"।बदलाब की शुरूवात,सकारात्मकता के साथ(Change started,with positivity) होनी चाहिए।

बदलाब की शुरूवात,सकारात्मकता के साथ(Change started,with positivity)माधुरी बाजेपेयी

             यह सब कब सम्भव होगा,जब हमारा परिपालन ऐंसे वातावरण में हो जहां का परिवेश बदलाब की सकारात्मकता से सराबोर रहे। लेकिन कभी-कभी विषम परिस्थितियों में कमल के समान हमारी अपनी परिपक्वता को प्रदर्शित करते हुए,सार्थक प्रयासों में संलग्न रहें । 

💥अपनी खुशियों को चारों तरफ फैलाने की जबरदस्त प्रस्तूति,अब तो आप खुशी फैलाकर ही रहोगे,यदि इसे पढा तो एक बार मुस्कुराकर ही रहोगे।

एक कहानी से समझें :-

बदलाब की शुरूवात,सकारात्मकता के साथ(Change started,with positivity)
            एक समय की बात है,तिवारी परिवार की सबसे छोटी सदस्या कुमारी शीतला तिवारी के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है-जब उसका जन्म दिन आया,तो ठीक उसके पहले परिवार एक विशेष आर्थिक विषमता को समाप्त करने हेतु पूर्ण साहस से सब कुछ एक ही बिषय में मन,शरीर लगाया हुआ था,क्योंकि परिवार का संचालन एक ही व्यवसाय से चल रहा था जो कि आर्थिक विषमता से गुजर रहा था ,घाटा पे घाटा खा रहा था । परिवार के मुख्य सदस्य बड़े चिंता में थे,इतने की घर की लाडली के तरफ वे ध्यान ही न दे पाए।

            पिता की लाडली शीतला के बहुत मित्र थे,कुछ ऐंसा ही हुआ कि सुबह से शाम हो गई किसी ने फोन पर,या सखियों व सखा ने घर आकर शुभकामना भी नही दी ,अब जैसे उदासी उफान पर थी,खिलखिलाती शीतला आज घर के किसी कोने में बैठी थी और उसके मन मे चल रहा था।

'मेरी सबसे करीबी सखी ने मुझे मेरे जन्मदिन पर फोन नहीं किया?? जब भी मुझे मदद की जरूरत होती है, तो वह मुकर जाती है,मेरे परिवार के सदस्य भी मुझे ध्यान में नहीं रखते। कोई मेरी भावनाओं को नहीं समझता '। जाओ अब में किसी से बात नहीं करूंगी।

ऐंसा कहती-कहती वह अश्रु बहाते-बहाते सो गई,जब पिता शाम 7 वजे घर आये,तो उन्होंने लाडली शीतला को आवाज दी ।

           जब अधिक समय से आवाज के माध्यम से पिता ने शीतला को पुकारा तो वह नहीं आई, बेटी को पिता ने ढूंढना चालू कर दिया,कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि एक कोने में सिमटी हुई लाडली सो रही है,पिता ने गोद मे शीतला को उठाया,अपने गले से लगाया,और बैठक कक्ष में लाकर उसे जगाया।

            पूंछा बेटी शीतला !  'कोने में क्यों सो गयी- तब शीतला जागी, और धीरे -धीरे आंखे खोली और कहा पिता जी आज मेरा जन्म दिन है,और न आप,न कोई मुझे शुभकामना दे रहा,न कोई मेरे साथ है,इसी लिए में अकेली सो गई।'

            पिता दुखी हुए पुत्री को कहा अरे वाह!आज मेरी बेटी का जन्म दिन है,बहुत अच्छा,और सारे सदस्यों को सामूहिक रूप से बुलाकर,इसके साथ-साथ सखियों को भी बुलाया गया,कार्यक्रम पूर्ण हुआ,लाडली शीतला खुश हो गई,सभी विदा हुए। 

            और पिता ने लाडली शीतला को गोदी में लेकर समझाया कि कभी-कभी छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत ज्यादा शिकायत नहीं करना चाहिए। इसी वजह से अपने आसपास के लोगों के साथ उनके संबंध बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं और उसके लिए वे हमेशा दूसरों को ही दोषी ठहराते हैं। इसलिए बेटी कभी भी ध्यान रखना यह बात हमेशा काम आएगी। इस के बाद पिता ने लाडली को सुला दिया।

आप सभी ने भी अपने आसपास कुछ ऐसी ही घटना होते जरूर  देखा होगा ।

             ऐसा देखा गया है कि - जिन बच्चों के परिवार का माहौल खुशनुमा होता है । बड़े होने के बाद वे अपने सभी रिश्तो को कुशलता से निभा पाते हैं। इसके विपरीत जिन बच्चों के परिवार का माहौल तनावपूर्ण होता है या जिनके माता-पिता को दूसरों में कमियां निकालने की आदत होती है बाद में उनके बच्चे अपने पारिवारिक सामाजिक संबंधों को सहजता से नहीं निभा पाते हैं।

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हमेशा ध्यान रखें कि कोई नहीं होता पूर्ण

           कोई भी मनुष्य पूरी तरह से पूर्ण नहीं होता, हम सब में कोई ना कोई कमी जरूर होती है, हमेशा दूसरों में कमियां ढूंढ कर उनसे किनारा करने वाले इंसान के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आता है,जब वह बहुत अकेला पड़ जाता है ऐसे लोगों का कोई भी रिश्ता  सहज नहीं हो पाता।

चाहे दाम्पत्य जीवन हो या सामाजिक जीवन हो,हर जगह इन्हें दूसरों में कोई ना कोई कमी नजर आती है।

           इसी के आधार पर साथ वाले व्यक्ति के साथ अक्सर इनका बर्ताब नाराजगी से भरा होता है । ऐसी आदत का सामाजिक संबंधों में बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ऐसे लोगों का चिड़चिड़ा स्वभाव उनके दोस्तों और रिश्तेदारों को उनसे दूर कर देता है।

समस्या की पूर्णता (Problem  perfection)

           जो लोग पूर्णतावादी होते हैं अपने कामकाज ही नहीं बल्कि दूसरों के व्यक्तित्व में भी पूर्णता की तलाश करते हैं। इसलिए उन्हें हमेशा दूसरों की कमियां ही दिखती हैं,अपने किसी भी रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए ऐसे लोग अपनी ओर से कोई पहल नहीं करते। कई बार तो छोटी-छोटी बातों की वजह से नाराज होकर अच्छे संबंधों को भी बिगाड़ देते हैं। 

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हर समय सम्भव होगा,बदलाब 

           अगर आपको ही अपने भीतर कुछ ऐसीं आदतें दिखाई देती हैं तो इसके लिए शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है।किसी भी इंसान में खूबियों के साथ कुछ खामियां भी होती हैं । अगर सकारात्मक सोच के साथ कोशिश की जाए तो ऐसी आदतों में आसानी से बदलाव लाया जा सकता है।

       1) चाहे कोई भी रिश्ता हो उसे अच्छी तरह निभाना भी एक कला है और इसके लिए दूसरों की छोटी-छोटी खामियों को नजरअंदाज करना जरूरी होती है।

      2) अगर किसी की बातों से आपको दुख पहुंचा हो तो भी उसे भूल कर नए सिरे से अपने संबंध सुधारने की कोशिश करें ।

      3) कभी खुद को दूसरों की जगह पर रख कर देखें,इससे आपके लिए अपने व्यवहार में सुधार लाना आसान हो जाएगा।

              रिश्तो को मजबूत बनाने के लिए भावनाओं के साथ समझदारी की भी जरूरत होती है, इसलिए हमेशा अपना व्यवहार संतुलित रखें ।

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श्रीमती माधुरी बाजपेयी


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