प्रार्थना एक रोचक विषय (Prayer is an interesting topic)

प्रार्थना Prayer

                  बहुत समय से मनुष्य प्रार्थना prayer को  कृत्य की तरह दोहरा रहे हैं। सदियों से दोहराया गया है। केवल दिखावटी संस्कार है मनुष्य को दोहराना ही समझ में आता था,दोहरा लेता है। यह एक तरह की संस्कारबद्ध गुलामी पैदा हो गयी। यह प्रार्थना prayer नहीं।This is not prayer.प्रार्थना तो एक रोचक विषय है(Prayer is an interesting topic)। चुप्पी के क्षण, मौन के क्षण, सौंदर्य भाव—बोध के क्षण, प्रीति की अनुभूति, मैत्री का भाव, तन्मयता,विमुखता इन शब्दों से मैं कहना चाहती हूं कि प्रार्थना prayer क्या है ?? (what is prayer ?? ) इन सारे शब्दों में भी प्रार्थना prayer पूरी नहीं हो जाती, बस इन शब्दों में थोड़े से संकेत मिलते हैं। ( Not all of these words are prayer fulfilled, but there are few clues in these words.)


प्रार्थना एक रोचक विषय (Prayer is an interesting topic)

प्रार्थना के दौरान हिब्रू में कोई शब्द उच्चारण नही किया जाता है।

आप यह जानकर दंग होगे कि विश्व में यहूदियों की एक मातृभाषा हिब्रू है,इस भाषा में प्रार्थना prayer के लिए कोई शब्द है ही नहीं।

रोओ, हंसों, गाओ, नाचो, पुकारो, पर प्रार्थना के लिए कोई शब्द नहीं। क्योंकि प्रार्थना prayer शब्दातीत है। हिब्रू भाषा ने सदव्यवहार किया, प्रार्थना prayer को कोई शब्द नहीं दिया। प्रार्थना prayer क्या हो सकती है??,What can the prayer be??(ईश्वर) उसकी तरफ इशारे किये। 

हर तरह कि क्रिया चाहे शारीरक हो या मानसिक जो प्रार्थना में की जाती है वे सब सिर्फ इशारे होते हैं। प्रार्थना prayer इन सबसे बड़ी होती है। प्रार्थना इतनी विराट है जितना विराट आकाश है। प्रार्थना उतनी ही बड़ी है जितना बड़ा परमात्मा है। प्रार्थना prayer परमात्मा से छोटी नहीं है, क्योंकि,प्रार्थना के क्षण में हम परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं। प्रार्थना prayer का क्षण सेतु है। जोड़ता है। हम खो गये।जब भक्ति परिपूर्ण होती है, भक्त नहीं बचता। और जब तक भक्त बचता है तब तक भक्ति परिपूर्ण नहीं है।

ऋषि शांडिल्य के अनुसार 

ऋषि शांडिल्य ने इसी प्रार्थना prayer को भक्ति के दो रूप में कहा है - "एक को 'गौणी भक्ति' कहा और एक को 'पराभक्ति' कहा।"

'गौणी भक्ति'

जब प्रार्थना prayer,में भक्त बचता है,तब तक 'गौणी भक्ति'। अर्थात नाममात्र की भक्ति। वस्तुत: ये कोई भक्ति पूर्वक प्रार्थना prayer है नहीं, कहने मात्र को भक्ति। भक्ति जैसी लगती है, इसलिए भक्ति कहा, मगर भक्ति है नहीं। अभी भक्त मौजूद है,भक्ति कहां होगी ?

पराभक्ति

जब भक्त खो गया,तब पराभक्ति। अर्थात तब असली भक्ति पूर्वक प्रार्थना prayer है,अब केवल भगवान ही बचा! तो प्रार्थना उतनी ही बड़ी है जितना बड़ा परमात्मा है।

और हम अगर प्रार्थना को समझना ही चाहें, तो प्रार्थना करनी नहीं पड़ेगी, प्रार्थना तो स्वतः हो ही जाती है । मेरे यहाँ लिखने से नहीं होगी पुर्ण बात। जब भी भी हम अपने मन को तरंगित कर पाएं और ऐसे क्षण सभी के जीवन मे आते हैं, मगर हम चूक-चूक जाते हैं।

प्रार्थना - शब्दों व समय के पार है,जो कभी भी हो सकती है-

ध्यान रहे - आप प्रार्थना prayer के लिए कोई समय तय मत कर लेना। ऐसा मत कर लेना कि रोज सुबह स्नान करके प्रार्थना करेंगे। हमेशा ध्यान रखना - आवश्यक नहीं है कि स्नान के बाद हमारे मन में प्रार्थना prayer की तरंग हो ही। प्रार्थना prayer को निर्धारित मत कर लेना। प्रार्थना prayer कब आ जाएगी, कब अचानक बादल फट जाएंगे और आकाश खुलेगा, कोई नहीं जानता सुबह कि सांझ, कि भर दुपहर, कि आधी रात! जब भी ऐसा हो जाए कि मन तन्मय हो, जब भी ऐसा हो जाए कि मन में कोई विचार न हों, जब भी ऐसा हो जाए कि मन में कोई ऊहापोह न चलता हो, बवंड़र न उठते हों, आधिया न हों, तरंगें न हों, लहरें न आती हों  और ऐसे क्षण सब को आते हैं, मैं फिर दोहरा दूं जब ऐसे क्षण आएं, तब झुक जाना।

बस शांत होकर देखिए कि  प्रार्थना के क्षण आपको क्या लग रहा है -

प्रार्थना के क्षण आप क्या बोलेंगे, इसको बताने की आवश्यक्ता नहीं। कुछ बोलने जैसा आ जाए तो बोल लेना, कुछ कहने का मन हो जाए तो कह देना, कोई शब्द भीतर दोहरने लगे तो दोहरा लेना, कोई गीत की कड़ी गूंजने लगे तो गूंज जाने देना, मगर चेष्टा करके मत करना। ऐसा मत करना कि अब किसी आडम्बर से युक्त प्रार्थना को दोहराऊं। उसी दोहराने में समाप्त हो जाएगी प्रार्थना prayer।

प्रार्थना prayer बड़ी कोमल है।ये आडम्बर से भरे पत्थर आपने पटका कि समाप्त हो जाएगी। प्रार्थना में सावधान आप किसी भी तरह की कोशिश मत करना,भीतर से उठने लगे यदि राम राम, अनायास हो जाए, तो हो जाने देना। फिर ठीक है। अपने से जो हो, ठीक है, यदि आडम्बर से भरकर राम,राम दोहराब किया जाए,वही गलत है। प्रार्थना के जगत में यह नियम है प्रार्थना prayer अपने से जो हो जाए।

प्रार्थना prayer के समय निर्दोष हो जाएं

कभी कभी अनर्गल शब्द उठ सकते हैं। बच्चों को तो आपने देखा ही होगा  छोटे छोटे बच्चे कुछ भी शब्द पकड़ लेते हैं, दोहराए चले जाते हैं—कभी वैसा हो सकता है। प्रार्थना में तो निर्दोष बच्चे जैसा हो जाना है। या जैसे कभी आपने शास्त्रीय संगीतज्ञों को आलाप भरते देखा है, वैसा आलाप पैदा हो सकता है जिसमें कोई शब्द भी नहीं है, सिर्फ स्वर है। या सब सन्नाटा हो सकता है। 

प्रार्थना prayer के क्षणों में  बहुत कुछ होता है

प्रार्थना बड़ी है, सबको समा लेती है, किसी एक घटना में सीमित नहीं है। कभी सन्नाटा हो जाएगा इतना कि हाथ पैर भी न हिलेंगे। और कभी ऐसा भी हो जाएगा कि ऐसी ऊर्जा उतरेगी कि नाचे बिना नहीं चलेगा। फिर जैसा हो! कभी गोरख जी की तरह बैठना हो जाए, तो बैठ जाना, कभी मीरा बाई जी की तरह नाचना हो जाए,तो नाच लेना। ध्यान रहे :- चेष्टा करके नाचना भी मत, चेष्टा करके बैठना भी मत।

कैसे होगी प्रार्थना prayer

जब तक कृत्य है तब तक प्रार्थना नहीं, क्योंकि कृत्य में कर्ता है।और कर्ता में अहंकार है। आप सिर्फ खुल जाना। जैसे सुबह की हवा आती है और फूल को नचा जाती है। और सुबह का सूरज उगता है और फूल की पंखुडिया खिल जाता हैं—बस ऐसे ही ! आप हमेशा केवल उपलब्ध रहना। यदि आप पर  परमात्मा कुछ करना चाहे तो होने देना, कुछ न करना चाहे तो चुपचाप जैसे हैं वैसे ही रहें। जल्दी ही आपको प्रार्थना का स्वाद लगने लगेगा।

प्रार्थना के क्षणों की अनुभूति

प्रार्थना स्वाद है। शब्द नहीं, विचार नहीं, प्रत्यय नहीं, सिद्धांत नहीं । और तो और आपके भीतर एक मिठास भर जाएगी। जैसे भीतर कोई मधुकलश फूट गया, रोएं रोएं में मस्ती आ गयी। आंखें गुलाबी हो जाएंगी, जैसे नशे में हो जाती हैं। पैर कहीं के कहीं पड़ेंगे, जैसे शराबी के पड़ते हैं।आप इन क्षणों की प्रतीक्षा तो कीजिये । ये क्षण आते हैं। ये छोटे-छोटे क्षण हैं,और यदि इन्हें पकड़ लिया,तो ये ही क्षण बड़े हो जाएंगे।

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अब जान ही लीजिए रोचक रहस्य जब प्रार्थना शुद्ध होती है तो जीवन मे क्या होता है । अवश्य ही पढ़े यह अपनो के लिए जादू भरी post है।


श्रीमती माधुरी बाजपेयी
मंडला,मध्यप्रदेश,भारत

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