मन का स्वरूप | आधी अग्नि आधा जल | power of mind can take a man to the pinnacle of excellence

      मानव शरीर में सबसे रहस्यमय अगर कुछ है तो वह केवल मन है, मन से ही संसार है, मन से ही जड़, मन से ही चेतन और मन से ही परमात्मा भी है।

     अधिकांश साधक मन को समझ ही नहीं पाते हैं। मन इतना ज्यादा चालाक है कि आपको बिना हवा लगे भ्रम में बनाए रखता है। जड़ और चेतन दोनों प्रकार के पदार्थों में भेद केवल मन का ही है।

                                                                          मन का स्वरूप 

       आसान शब्दों में समझाता हूं, प्रकृति में निर्जीव कुछ भी नहीं है, आप कह सकते हैं कि एक पत्थर निर्जीव नहीं है क्या। तो आपको बता दूं कि बिल्कुल भी नहीं, एक कठोर से कठोर पत्थर भी अपनी आयु लेकर पैदा हुआ है तथा वह भी मृत्यु को प्राप्त होता है। उसकी मृत्यु के समय वह भी बूढ़ा हो जाता है तथा जरा से बल से ही टूटने लग जाता है और आखिर में झड़ने लगता है तथा रेत में तब्दील हो जाता है।



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परन्तु फिर भी हम उस जीवित नहीं मानते क्योंकि, उसमें मन की उपस्थिति नहीं है, उसे अपने अस्तित्व की उपस्थिति का भान नहीं है। यही जड़ पदार्थ है।
                दूसरी तरफ जिसे अपने होने का, अपनी उपस्थित का भान है वह चेतन पदार्थ हैं। जिसमें सभी जीव जंतु आदि आते हैं।
अपने होने एवम् उपस्थिति का भान कराने वाला हमारा "मन" ही है। अर्थात, मन की उपस्थिति ही जीव और निर्जीव का भेद बताती है।

    उदाहरण  के अनुसार : -   शरीर तो सब एक ही हैं, चाहे वह अमीर का है या किसी गरीब का है। उनमें कोई भेद नहीं है सबको भूख प्यास आदि लगती है किन्तु सब में जो भेद है वह उन शरीरों में उपस्थित मन की स्थिति के कारण ही है।

     आपका मन किस स्थिति में उपस्थित है यही जान लेना आत्म बोध है और धारणा एवम् ध्यान के द्वारा मन को संचालित कर लेने की सिद्धि ही मोक्ष है।

     मन में कई बार यह प्रश्न आता है कि,

     जब सारे मनुष्यों के शरीर एक जैसे ही हैं तो फिर उनमें इतना भेद क्यूं है? और  ये भेद आया कहां से है?  कोई अमीर है, कोई गरीब है, कोई कला का धनी है, तो कोई  महान वैज्ञानिक है, तो कोई राज कुल में जन्म लिए बिना भी राजा बन जाता है। ऐसा कैसे हो जाता है?

      निश्चित ही इस भेद को जानने का प्रयास होना चाहिए। ये एक प्रश्न है जो हल होना चाहिए, एक जिज्ञासा है जो शांत होनी चाहिए। किन्तु, हमारे पूर्वजों ने इस जिज्ञासा को एक शब्द(प्रारब्ध) के द्वारा जोड़ बड़ी चालाकी से शांत कर दिया है।

  पूर्वजों के कथन अनुसार इतने भेद का कारण प्रारब्ध है, उसने पूर्व जन्म में पूण्य कमाया है इसलिए वह आज रंक से राजा हो गया है।

मन की शक्ति की दिशा ही हमें जो बनना चाहते हैं वह बनाती हैं :‌‌-  

         किन्तु, मेरा पूर्वजो जेसा मानना नहीं है, सभी एक से शरीरों में आत्मा भी एक सी ही हैं,बस उनमें भेद केवल मन का है। हम अपने मन को कहां और किसमें लगाए हुए हैं यही भेद को उत्पन्न करता है।  हम अगर अपने मन को गणित में उलझाए रखेंगे तो निश्चित ही गणितज्ञ बनेंगे, संगीत में रमा कर रखेंगे तो निश्चित ही संगीतज्ञ बनेंगे। कोई रोक नहीं सकता हमें।

 हामारा मन बहुत सामर्थ वान :-

      मन का जो रहस्य है। वो इस बात को लेकर भी है, कि वही ऐसा सामर्थ वान है- जो हमें इस स्थूल जगत से भी जोड़ कर रखता है और उस सूक्ष्म जगत से भी। ये मन ही है, जिसमें पारलौकिक शक्ति को संग्रह कर के रखने की क्षमता होती है। यही मन है जो, ऊर्जा(आत्मा) को स्थानांतरित करता है।  अगर आप मन को लक्ष्य में स्थिर करने की कला जान जाते हैं तो फिर आप में संकल्प शक्ति के स्वामी हो जाते हैं और सब कुछ जैसे आपकी मुट्ठी में आने लगता है।परमात्मा को प्राप्त करने का अथवा जानने का माध्यम केवल मन ही है।


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     यह सर्व विदित है कि, संसार में जितने भी पाप होते हैं, उन सब को करने वाला, उन सब के पीछे का कारक केवल मन ही है। बिना मन के तुम एक कदम  भी नहीं चल सकते, एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते इसलिए, ये मन ही है जो हमें, हमारे मूल से भटकाए हुए है। हमें संसार के माया जाल में फंसाकर रखे हुए है। मायाजाल में या कह लो कि मोह जाल में।

अब प्रश्न यह भी उठता है कि 
   ये मन मायाजाल में फंसता ही क्यूं है ?
      मोहित होता ही क्यूं है,?

     तो इसका उत्तर है कि, इन्द्रियों के कारण। ये इन्द्रियां ही हैं जो मन को अपने वश में जकड़े रहती हैं। सुख की चाहना भी इन्द्रियों की ही होती है, इन्द्रियां ही तृप्त होने की चेष्टा लिए मन को भ्रमित किए रहती हैं जब तक कि वो तृप्त न हो जाएं।

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इन्द्रियां की शक्ति का कामाल

      यही कारण है कि, इन्द्रियों की तृप्ति के बाद मन एक बार को ग्लानि से भर जाता है और स्वयं को धिक्कारने तक लग जाता है। ये इन्द्रियां ही मन को संसार से जोड़े रखती हैं, और बार बार मोहित होती हैं। इन इन्द्रियां कि शक्ति से अंदाज़ा आप इससे ही लगा सकते हो कि वे ही अपनी तृप्ति के लिए मन, बुद्धि, चित्त और विवेक तक को नष्ट कर देती हैं , और पाप को भी तर्कसंगत बना देती हैं। तब मन भ्रमित हो जाता है, और पाप कर बैठता है।

    इसलिए, साधक को वैराग्य धारण करने के लिए बोला जाता है, ताकि इन्द्रियों के मोह को रोका जा सके और शुद्ध सात्विक अल्प आहार के लिए भी प्रेरणा दी जाती है क्योंकि, आहार ही इन्द्रियों को शक्ति प्रदान करता है। तब इस अवस्था में मन संकल्प करने में सक्षम हो पाता है।


विरक्त


 


ओढ़ ली चादर मैंने, 
मुंह को ढक लिया,
दुख सुख एक सा जानकर,
विरक्त अमृत चख लिया.....


छुप गया चांद गगन में
तारों का टिम टिमाना रुक गया
पूनम की सुंदरता न रही
अमावस सा हृदय हो गया
ओढ़ ली चादर मैंने
मुंह को ढक लिया,
दुख सुख एक सा जानकर
                                                                                                                     विरक्त अमृत चख लिया...
 

रेत, हरियाली एक सी
भोर, संध्या का भेद मिट गया,
कौन आया मन में मेरे, 
कौन मन से मेरे उचट गया,
ओढ़ ली चादर मैंने,
मुंह को ढक लिया,
दुख सुख एक सा जानक,
विरक्त अमृत चख लिया...


देह छलनी छल रही,
मन में माया विकार भरे,
कुछ भी अपना मिलता नहीं,
भ्रम को ही बस पाल रहे,
सच को ढूंढ़ना पड़ रहा,
कैसा ये मंजर हो गया,
ओढ़ ली चादर मैंने,
मुंह को ढक लिया,
दुख सुख एक सा जानकर,
विरक्त अमृत चख लिया...



मन का स्वरूप | आधी अग्नि आधा जल | power of mind can take a man to the pinnacle of excellence
                     लेखक
      जवाहर सिंह(K Ramchandn)
      Village and post- सरेंधी
       District- Agra

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