धैर्य का जादू ,मन में काबू | Power of Emotion | श्रेष्ठचिन्तन | Patience is power

      जीवन का अमूल्य पल का निर्माण,धैर्य से ही सम्भव है,जीवन के किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति में सबसे कीमती हिस्सा धैर्य का ही होता है,

इसलिए तो धैर्य का अर्थ है, अनंत की प्रतीक्षा की क्षमता

     कभी कभी आतुर मन,वासना से इतना ग्रसित हो जाता है कि उसे लगता है,आज ही मिल जाए लक्ष्य, अभी ही मिल जाए लक्ष्य, ऐसी मन की वासना हो तो कभी नहीं मिलता लक्ष्य। लेकिन धैर्य का जादू बहुत कीमती है,क्योंकि धैर्य में भाव "कुछ ऐंसा होता है कि मैं प्रतीक्षा करूंगा,चूंकि राह मेरी सही है और अनुकूल है, तो कभी भी मिल जाए लक्ष्य, मैं मार्ग देखता रहूंगा, राह देखता रहूंगा, बाट देखता रहूंगा।

    यदि लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति का हो और मार्ग में सम्पूर्ण श्रम मनोशरीर का लक्ष्य पर दांव के रूप में लग जाये तब धैर्य के श्रेष्ठतम भाव की अभिव्यक्ति जीवन बदल सकती है कि " हे ईश्वर! अनंत—अनंत जन्मों में, कभी भी जब तेरी कृपा हो मिल जाए।"

     इस तरह के शुद्धतम भाव मे अधिक संभावना है कि वह तो अभी और यहीं भी मिल सकता है। जितना गहरा धैर्य, उतनी ही जल्दी होती है,शुभ घटना। जितना निम्न धैर्य, उतना ही अधिक समय उसकी कृपा में लग ही जाती है।

     हम सभी अपने-अपने जीवन मे देखते ही होंगे कि कुछ लोग थोड़े से रुपए कमाने के लिए पूरी जिंदगी  दांव पर लगा सकते हैं, और प्रतीक्षा करते रहते हैं, कि आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों एक चाह गहरी जो है, धन को पाने की,धनिक बनने की,सम्पूर्ण खजाना को पा धनपति के भी शिखर में पहुंचने की, इसलिए प्रतीक्षा कर लेते हैं। 

     लेकिन हद तो तब हो जाती है कि - ईश्वर के लिए वह सोचता है कि कहीं एकाध बैठक में ही उपलब्ध हो जाए। और वह बैठक भी, वह तब निकालता है, जब उसके पास अतिरिक्त समय हो,जो धन की खोज से,धन प्राप्ति हेतु भागमभाग की दौड़ से बच जाता हो।

     देखते हैं जब छुट्टी का दिन होगा,अवकाश का समय होगा,तो ईश्वर में डूबेंगे। और फिर वह चाहता है, बस किसी भी हालत में जल्दी ही मुक्त हो जाए। इस प्रकार जल्दी मुक्त हो जाने की बात ही यह बताती है कि ईश्वर प्राप्ति- नोकरी/व्यवसाय करने जैसा हो गयी। और जैसा कि आप चाहते हैं कि जैसे नोकरी/व्यवसाय में आप सोचते हो जल्दी मुक्त हो जायें, वैसे ही ईश्वर के पास जाने में,उनके साथ एक रस होने में,उनपे पूर्ण मनोयोग से न्यौछावर होने में आप शीघ्रता,तीव्रता करने लगते हैं। 

       क्यों??? शायद ऐसी कोई चाह है ही नहीं कि हम पूरा जीवन शुद्धतम व प्रमाणिक रूप से सम्पूर्ण मनो-शरीर के योग से मनोशारीर को ईश्वर के पास जाने की राह में,दाँव पर लगा दें।

धैर्य का जादू ,मन में काबू | Power of Emotion | श्रेष्ठचिन्तन | Patience is power

Importance of patience in work | धैर्य का जादू

  " हमेशा ध्यान रखिये,बड़ी से बड़ी उपलब्धी तब तक नहीं मिलती, जब तक कोई भी अपना सब कुछ समर्पित करने को सम्पूर्ण रूप से तैयार नहीं होता।"

"लक्ष्य प्राप्ति की तैयारी हो भी गयी, लेकिन लक्ष्य के पास जाने वाले केंद्र में जब तक सम्पूर्ण समर्पण से लक्ष्य प्राप्तकर्ता उतर न जाये,तब तक बड़ी उपलब्धी नहीं मिलती।"

धैर्य का जादू | What is patience :-

    धैर्य का अर्थ बड़ा ही सीधा है,सब कर लिए जो हो सकता था मुझसे,अब हमारे पास न तो दाव पर लगाने को कुछ शेष है,और न ही परमात्मा को प्रत्युत्तर देने के लिए कुछ शेष है,यह भी ध्यान दें कि हमारे पास न सौदा करने के लिए कुछ शेष है, हमारे पास कुछ भी नहीं है। और मांगें हमारी हैं कि अब तो मिल जाए श्रेष्ठ/लक्ष्य/परमात्मा। लेकिन प्रतीक्षा तो करनी पड़ेगी। धैर्य तो रखना पड़ेगा और 2-3 दिन का नही,बड़ा लक्ष्य हो तो कभी-कभी अनंत समय रखना पड़ेगा। 

    लेकिन ऐंसा नहीं है कि इस प्रकार धैर्य रखने के दो—चार दिन बाद फिर हम पूछने लगें। तो इस अधीरता से उसमें वैसा ही नुकसान होता है,जो आपने कभी देखा होगा जैसे :-  छोटे-छोटे बच्चे कभी आम की गुही को धरती पर बो देते हैं, जमीन में और दिन में चार दफे उखाड़कर देख लेते हैं कि अभी तक, अंकुरण क्यों नहीं निकला? 

     हमेशा ध्यान दें:- अधैर्य से, अंकुर कभी नहीं निकलेगा। यह चार दफे उखाड़ने में अंकुर कभी नहीं निकलेगा। अंकुर निकलने का अवसर भी तो नहीं मिल पा रहा है।

     इसलिए,भूमि में किसी बीज को बोकर भूल जाना चाहिए, फिर प्रतीक्षा करनी चाहिए।इसके साथ-साथ भूमि में बीज लगे स्थान पर अब पानी भी डालें जरूर।समय-समय पर खाद डालें,और भी सारे उपयोगी वस्तुएं उसे समय-समय पर दें।परन्तु बीज को मिट्टी से हटा-हटा कर कभी मत देखते रहें—क्यों कि अभी तक बीज फूटा ही नहीं! ऐंसा करेंगे तो फिर कभी भी बीज नहीं फूटेगा, बीज खराब ही हो जाएगा। तो सावधान,कुछ लोग खुद को परमात्मा के मंदिर में प्रवेश करने हेतु ध्यान करके,साधना में संलग्न होकर,प्रेम में डुबकी लगाकर, हर बार न पूछें कि अभी पहुंचे, कि नहीं पहुंचे।बस सम्पूर्ण मनोयोग से बोते जाएं, सींचते जाएं। जब अंकुर निकलेगा, तब पता चल जाएगा। हमेशा ध्यान रखिये कि बस जल्दी न करें।

    क्योंकि जैसे ही धैर्य गहरा हुआ,तो प्रतीक्षा गहरी हुई,और प्रतीक्षा गहरी होने से अथवा धैर्य गहरा होने से सुनिश्चितता बढ़ जाती की अंकुर बस अब निकला कि तब निकला।

धैर्य की कहानी एक सूफी हुआ आत्मज्ञानी :- 

   सूफियों की परंपरा में एक अनमोल हीरा हुआ हीरा इन अर्थों में क्योंकि धैर्य की तलवार ने उसके अस्तित्व को हीरे जैसा चमक के अद्भुत आभा से भर दिया ,जो सूफीयों की परमात्मा की प्राप्ति की विधि पर एक समय शिखर पर था,उस फकीर का नाम बायजीद था। वह अपने गुरु के घर बारह वर्षों तक था।बड़ा ही अजीब रहा होगा, बायजीद । उसने बारह वर्षों तक गुरु से यह भी कभी न पूछा कि मैं क्या करूं,?? बारह वर्ष बाद एक दिन गुरु ने कहा,बायजीद,तू यहाँ,किसलिए आया है,तू कुछ पूछता ही नहीं। 

  तो बड़े ध्यान से पढियेगा बायजीद ने क्या कहा,उसने कहा :- मै प्रतीक्षा करता हूं,निश्चित ही,जब आप पाएंगे कि मैं योग्य हूं तो आप खुद ही कह देंगे।

    यह संन्यासी का लक्षण है। बारह वर्ष की सहज प्रतीक्षा, उसका गजब का धैर्य रहा होगा,उसका नियमित कार्य था कि वह :- 

1)सांझ आकर गुरु के पैर दाब जाता है।
2)सुबह कमरा साफ कर देता है।
3)चुपचाप बैठ जाता है।
4)दिनभर बैठा रहता है। रात जब गुरु कह देते हैं कि अब मैं सो जाता हूं तो चला जाता है।अद्भुत रही होगी ईश्वर मिलन की अभीप्सा उसकी।

   फिर एक दिन पुनः बारह वर्ष बाद गुरु पूछता है- बायजीद, बहुत दिन हो गए तुझे यहाँ आए, कुछ पूछता क्यों नहीं है???

   अब बड़ी कीमती बात पढिये अब तो बायजीद कहता है,"जब मेरी पात्रता होगी, जब आप समझेंगे कि क्षण आ गया कुछ कहने का, तो आप ही कह देंगे। मैं राह देखता हूं।" और बायजीद ने आगे जो कहा उस पर सम्पूर्ण मन को एकाग्र करके पढियेगा, 

    "वायजीद कहता है कि-- जो मैं खुद की इच्छा से आपसे पूंछता,और उस पूंछने में भी जो आप मुझे प्रदान करते, वह इस तरह निरन्तर 12 वर्ष राह देखने में अपनेआप ही मिल गया। यहां तक कि मैं अत्यंत ही शांत हो गया हूं। यह 12 वर्ष कुछ किया नहीं, बस बैठकर गहरे सब्र से आतुर प्रतीक्षा की है। तो मैं एकदम शांत हो गया हूं। भीतर कोई विचार नहीं रहे हैं।"

इस कहानी ने हमें एक सूत्र दे दिया जिसे समझें :-

     निश्चित ही आतुरता विचार ला देती है। जल्दबाजी विचार पैदा करवा ही देती है। यद्दपि प्रतीक्षा हो, तो विचार शांत हो ही जाते हैं। लेकिन जल्दी कुछ हो जाए, इसी से मन में तूफान उठते हैं। कभी भी हो जाए, जब होना हो। और न भी हो, तो भी परमात्मा पर छोड़ देने का नाम प्रतीक्षा है,ध्यान रहे कि बस आपको पता होना चाहिए कि मार्ग ठीक है,राह में किये जा रहे आपके द्वारा कार्य भी सम्पूर्ण मनोयोग से किये जा रहे हैं। और तो और किसी से कोई शिकायत है, ही नहीं।

धैर्य का कमाल मातृत्व क्षमता बनी मिशाल :-

    जब कोई स्त्री के गर्भ में शिशु का निर्माण होता है तो अब उस शिशु के लिए,उसे समय से उठना,बैठना,कभी कभी तो कष्ट सहना, समय से भोजन करना,समय से पानी पीना। 

    समय-समय पर उचित दर्शन,चिंतन,मनन, का ध्यान रखना होता है,मां के गर्भ को सुरक्षित रखने की जबाबदारी सम्पूर्ण परिवार की भी हिस्सेदारी हो जाता है, समय पर औषधी सेवन, समय पर आनन्द के क्षणों में गर्भस्थ शिशु को खुशियों से भरते जाना,उसके सुखमय होने की ईश्वरीय प्रार्थना करना। किसी भी स्त्री को जो माँ बन गयी है उसे अपने जीवन का 90 प्रतिशत हिस्सा समर्पित शिशु को करना होता है,खुद को केवल 10 प्रतिशत हिस्से पर ही रहना होता है,मां हर कुछ करती है कि उसकी सन्तान सुरक्षित गर्भगृह से निकल कर संसार का हिस्सा बने।

     कभी विचार किया है आपने, कैसे होती होगी, इतनी प्रतीक्षा,इतनी तैयारी वह सब तैयारी केवल होती है एक मात्र विधि से जो है "धैर्य"। क्योंकि यही धैर्य बहुत बड़े कष्ट को भी राहत की सांस में बदल देता है। इसलिए धैर्य का कमाल मातृत्व क्षमता बनी मिशाल।

धैर्य की कहानी सन्त कबीर  की जुबानी

      एक समय कबीर दास जी के मन मे आया कि चलते हैं , बाग में,जहाँ सुंदर फूलों से महकता हुआ बाग हो और वे निकल पड़े बगीचे में,जैसे ही वे प्रवेशित हुए,तो वहां जैसे उनसे लोगों ने जो बताया था उस हिसाब से पुष्प नहीं थे। 

      कबीर आश्चर्य में पड़ गए,यह कैसे सम्भव है,तभी वे देखते हैं कि वहां एक माली भी है जो निरन्तर उन्हें पल्वित व पुष्पित करने के उद्देश्य से उनकी जड़ों में नियमित समय-समय पर खाद करीब सम्पूर्ण बाग में सौ घड़ा पानी नियमित डाल रहा है। यह सब कबीर दूर से उसी बगीचे में खड़े होकर देख रहे थे। अब उस बगीचे में वे नियमित जाने लगे,जैसे पहले भाव था,अब वह माली वैसे ही उन्हें पानी व खाद समय मे दे देता।

         कबीरदास जी जैसे ही वहां जाते 21वे दिन से ज्यादा  हो गए वे देखते हैं चारों तरफ सुगन्ध से भर पूर बाग था। 

तत्क्षण कबीर दास जी एक दोहा कहते हैं, और एक सूत्र का निर्माण किया :- 

"धीरे-धीरे से मना,धीरज से सब होई ।

माली सींचत सौ घड़ा ऋतू आये फल होई।।"

भावार्थः- कबीर दास जी कहते हैं हे मनुष्य के मन धीरे-धीरे कार्य कर,अर्थात मत दौड़ इतनी तेज की रोकना मुश्किल हो जाये,क्योंकि धीरज से ही सब सम्भव है,कबीर दास जी ने देखा,माली सींचत है 100 घड़ा पानी,किसी आशा से तो तुरंत फल,फूल नहीं आ जाते,उसके लिए गहरा धैर्य चाहिए,ऋतु का। 

      जैसे ही वह आये जैसे बाग को सुगन्धित पुष्पों और फलों से भर दिया है । वैसे आपके जीवन के बाग में सही दिशा की निरन्तर मेहनत ही आपके हमारे जीवन को फलीभूत कर  ही देगी।

धैर्यता हटी जल्दबाजी घटी

    धैर्यवान होने का अर्थ सरलता के साथ कार्य करना और परिणाम आने का इंतजार करना है। उतावलापन का आशय जल्द से जल्द परिणाम पाने की कोशिश करना है। प्रत्येक मनुष्य को धैर्य के साथ ही किसी भी काम को पूरा करना चाहिए। किसी भी काम में जल्दबाजी करना त्रुटिपूर्ण होता है। जल्दबाजी के चक्कर में नुकसान उठाना पड़ सकता है।

धैर्य की शक्ति सन्त कबीर की अद्भुत दृष्टि

    संत कबीरदास एक समय किसी ऐंसे स्थान पर घूमने निकले जहां उन्हें बहुत सारे हाथी दिखे और हाथियों को खिलाते हुए महावत दिखे बड़े ध्यान से कबीर दास जी ने उनकी खाने की स्थितियां महावत के खिलाने की स्थितियों को देखा,

    दूसरे दिन कबीर दास जी पुनः भ्रमण करने के लिए एक दूसरे विशेष स्थान पर गए जहां पर कुत्तों की संख्या ज्यादा थी, उन्होंने कुत्तों को देखा की वे कुत्ते अपनी भूख को शांत करने के लिए अलग-अलग जगह रोटी का टुकड़ा को मुंह में दबाए हुए, खाते हुए जा रहे हैं लेकिन एक टुकड़े से तो उनकी भूख मिटने नहीं वाली पुनः दूसरे टुकड़े के लिए फिर उनको आगे बढ़ना है इस तरह से दरबदर भटकते हुए उन्होंने अपना भोजन तलाश रहे हैं।

एक सूत्र की रचना हुई

     तब यह सब देख कर कबीर दास जी के मन में एक सूत्र का निर्माण हुआ कि हाथी स्थिर होकर, धीरे-धीरे धैर्यता के साथ अपना भोजन करता है और मन भर कर खाता है। जबकि कुत्ते को तो बिलकुल धेर्य नहीं है,क्योंकि उसे एक-एक टुकड़ा के कारण घर घर जाना पड़ता है। कुत्ते में धेर्य इतना कम है कि अपने लालच और चंचलता के कारण उसे दर दर भटकना पड़ता है, फिर भी उसका मन नहीं भरता। 

धैर्य का जादू नकारात्मक शक्ति पर काबू

"हो कठिन समय,धैर्य की शक्ति हो साथ,

 तो हो न पायेगा, 

 नकारात्मक विचारों की श्रंखला का विकास।"

     आप पाठक गण जानते होंगे कि समय और परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं होती हैं, हर व्यक्ति के जीवन में कभी अच्छा समय आता है, तो कभी बुरा समय से होकर गुजरना पड़ता है।

    लेकिन ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति की पहचान उसके बुरे दौर में ही होती है। ऐसा कहने के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि जीवन के अच्छे दौर में तो सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सही फैसला करने में सक्षम होता है, लेकिन जब स्थिति प्रतिकूल हों, तो उस समय व्यक्ति की सही प्रतिभा का आकलन किया जाता है।

सूत्र में ध्यान दीजियेगा :-

     धैर्य से प्रतिकूल परिस्थितियों में सही निर्णय लेने वाला व्यक्ति ही सफलता की ओर अग्रसर होता है और जो व्यक्ति ऐसे समय में अपने को नहीं संभाल पाता उसे विफलता हाथ लगती ही है। 

     महापुरुषों के जीवन से संबंधित घटनाओं को देख सकते हैं। जितने भी वैज्ञानिक और आविष्कारक हुए हैं, उन्होंने सालों तक अपने अनुसंधान की सफलता की प्रतीक्षा की है। उन्होंने कई असफल प्रयोगों को धैर्य के साथ आजमाया वे एकदम सफल ही नहीं हो गए, और हर असफलता के बाद फिर से उन्हें आगे बढ़ाया लेकिन उन्होंने अपना धैर्य कभी नहीं खोया।क्योंकि यही वह शक्ति है जो उन्हें आगे बढ़ाई।

धैर्य से वैर क्यों :-

    अब एक गुप्त राज में अपने पाठकों को समर्पित करती हूं वह यह कि केवल धैर्य ही आपको अपनी पूरी मानसिक क्षमता का उपयोग करने में सक्षम बनाता है,और जिसके कारण आप कठिन से कठिन चुनौतियों का सफलता पूर्वक सामना करने के योग्य बन जाते हैं। इसलिए धैर्य को बनाए रखने की प्रवृति का विकास करें। धैर्य रखने का सीधा मतलब अपने स्वभाव के शांत होने से है। जब आप शांत होकर स्थिरता के साथ चुनौतियों का सामना करते हैं और अपने को उत्तेजित नहीं होने देते तो आप इतना मजबूत हो जाते हैं कि किसी भी कठिनाई का सामना आप कर सकते हैं। 

आइये मजबूत हों धैर्य से बेर को समाप्त करें।

अब जानते कि हम अधीर क्यों हैं??

शिक्षा के कारण :- 

 भारत में हमेशा से ही गुरुकुल परंपरा हो चाहे परिवार की परंपरा हो ,पूजन की व्यवस्था हो या भोजन की सेवन की व्यवस्था हो औषधियों के निर्माण की व्यवस्था हो या औषधियों से शरीर में परिणाम आने की व्यवस्था हो,उचित रूप से उठने की व्यवस्था हो,या चलने की व्यवस्था, देखने की व्यवस्था हो या सुनने की व्यवस्था हो आदि-आदि सारी की सारी व्यवस्थाओं में एक बात को आज से कुछ साल पहले हम सभी जानते हैं वह है धैर्य से या धीरे से।

     लेकिन जो पश्चिमी देश से हमारे भारत में शिक्षा का तन्त्र आया है,जो धीरे धीरे ही सही चाहे विद्यालय व महाविद्दालय या विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम की पद्धतियां में हो या चाहे उन प्रणालियों में उन शिक्षा के आधार केंद्र में हो। धैर्य की बातें कहीं पर भी दिखाई नहीं देती, निरंतर चलने वाले अध्ययन में हम सीख ही नहीं रहे हैं,हम समझ ही नहीं रहे हैं, हम क्या कर रहे हैं, बस अधीरता ही अधीरता की शिक्षा का ज्ञान ले रहे हैं।

      हम छात्रों को छात्राओं को क्या सिखा रहे हैं बस केवल अभी तक हम सिखा रहे हैं कि अधीर रहो जिससे ही जीवन में कुछ मिल पाएगा, हम बेचैनी सिखा रहे हैं,हम महत्वाकांक्षा सीखा रहे हैं, हम भूल जा रहे हैं कि उनके मानस में यह बातें कितने गलत तरीके से स्थिर होते जा रही हैं।

      जिन मनुष्यों के जीवन मे शांति के फूल खिलना था अब वे हर अवसर पर चाह रहे हैं कि उसका सबसे पहला अवसर आ जाए और दूसरे का बिल्कुल अवसर ना आए क्योंकि जैसी अधीरता आती है, वैसे ही हम स्वयं को तो अशांत करके दुश्मन हो ही जाते हैं साथ-साथ दूसरों के भी अनावश्यक शत्रू हो जाते हैं,और यहां से प्रारम्भ होती है,अशुद्धता,हिंसा,वैमनस्य और भी बहुत कुछ।

"जब वक्त आपके साथ हो,तो कभी गुरुर मत करना,
जब वक्त आपके विपरीत हो,तो सब्र जरूर करना।।"

   दुख इस बात का है, भय इस बात का है कि धीरे-धीरे हम एक दूसरी दिशा में जाते जा रहे हैं, एक समय था जब पुरुषों को व महिलाओं को धैर्य की शिक्षा कहानियां व प्रयोग क्रमशः सुनाया व सिखाया जाता था,यहां तक कि उनके मस्तिष्क में वे सारी बातें स्थिर हो जाती थीं। उस समय हम सभी धैर्य में गढ़े थे,पढ़े थे,सुने थे,चले थे।

      काफी अध्ययन किए हुए हर छोटी से छोटी बातें हमारी माताएं,पिता,गुरु हमें सिखाते थे,और यह क्रम भारत के मानस को मजबूती देता था,इन्ही बातों के कारण हमारे संकल्प सिद्ध भी होते देखे जाते थे। लेकिन अब गड़बड़ हो गई है,अब लोग धैर्य से चूक गए हैं,धैर्य से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि उनके मानस में बालकाल ही नहीं यौवन काल में उनकी कल्पनाओं में हमने अधीरता को आधार बना दिया है।

अभिनय का क्षेत्र / फ़िल्म देखना भी कारण बन गया है,अधीरता का :-

    अभिनय के क्षेत्र में लोगों की अधिक रूचि देखी जा रही है लोगों ने अभिनेताओं को अपना आदर्श बनाना चालू कर दिया है और यह वह भूल गए हैं कि अभिनय करने वाला केवल भूमिका निभाता है जरूरी नहीं कि उसमें उन भूमिकाओं से संबंधित गुण भी विद्यमान हों और धीरे-धीरे यह पूरी की पूरी व्यवस्थाओं में अधीरता बढ़ते जा रही है। 

      अभिनय मनोरंजन न होकर हमारे जीवन का सार होते जा रहा है,और अभिनेता/ अभिनेत्रियों की हर बात,हमारे मानस का हिस्सा होते जा रही हैं,जिनमें उनके कपड़े पहने से लेकर सारी की सारी नियमित क्रियाएं भी शामिल हैं।

     इन अभिनय के कलाकारों की भूमिकाओं के अलग-अलग पात्रों के कारण लोगों के मानस में ऐसा लगता है कि धैर्य की कोई आवश्यकता ही नहीं है,क्यों ना हर काम जल्दी कर लिया जाए, जबकि लोग जानते हैं कि सारे काम जल्दी नहीं हो सकते कुछ काम तो हैं, जो धैर्य के बिना हो ही नहीं सकते। पूर्व काल में पुरुष ज्यादा दूरदर्शन, कल्पनाओं से भरे चलचित्रों (फिल्मों)  में रुचि लेते थे, लेकिन धीरे-धीरे महिलाओं ने भी अधिक मात्रा में इस अभिनय / फिल्मों के क्षेत्र में रुचि लेना प्रारम्भ किया,यहां तक बहुत अच्छी बात है,गड़बड़ यह हो गई स्त्रियों ने अपने जीवन का फिल्मों को हिस्सा भी बना लिया। इस प्रकार 3 घण्टों की फिल्मों के द्वारा अधीरता के इस प्रक्षिक्षण में शामिल हो गई।

    जीवन चलाने में मातृत्व क्षमता के विकास में,सौम्यता,व सुंदरता,वाणी में उच्चता का विकास बिना धैर्य के बिल्कुल भी सम्भव नही है। चूंकि सारी फिल्में केवल रुपयों को आधार बनाएंगी,चूंकि फ़िल्म एक उद्द्योग का हिस्सा हैं,उन्हें हमारे,आपके मानस की उच्चता से क्या लेना देना। तो अब यदि अधीरता देने में ज्यादा रुपया आता है ,तो अब फिल्में भी भिन्न-भिन्न तरीकों से यह अधीरता सीखाई जा रही हैं। 

   तो परिणाम यह होता जा रहा है कि :- धैर्य को भूलना चलन में आते जा रहा है,ऐंसा न हो,अभिनय ही आधार हो जाये,और जीवन बेकार हो जाये। जीवन मे स्वतंत्रता छिन जाये। 

*कभी खुद से भी कुछ प्रश्न करें क्या आपके जीवन का श्रेष्ठतम विकास में केवल अभिनेता व अभिनेत्रीयां ही जीवन का केंद्र हैं??
*क्या आपका जीवन हर दिन 5 minut के विज्ञापन और 3 घण्टे की फ़िल्म से ही विकसित हो रहा है ???
*जीवन मे सीखने का गुण न होकर क्यों हम औपचारिक / दिखावे में ग्रसित होते जा रहे हैं??

     धैर्य एक ऐसा गुण हैं जो चिंता और घबराहट भरी स्थिति को क्षण भर में शांति में बदल देता है। बस परेशानी यह है कि अधिकांश लोग इस गुण के जादुई प्रभाव को नहीं जानते, तभी तो आज जिसे देखो वह अधीर हो बैठा अपने और दूसरों के लिए मुसीबतें खड़ी करता रहता है।

    निश्चित ही आपने जाना होगा,कि धैर्यवान के पास रहने वालों को उसकी शांति की आभा का हरदम अहसास होता रहता है। उनका चुंबकीय प्रभाव सब पर दिखाई पड़ता है। 

   धैर्य को धारण करना एक रचनात्मक प्रक्रिया है जो हर कोई बड़ी आसानी से कर सकता है।

     आप जानते होंगे कि अधीरता के निर्माता हम खुद ही हैं। जैसे हमने निरंतर अधीर रहने की आदत को कई साल से पलवित किया है,पुष्पित किया है, ठीक उसी तरह हम धैर्य रखने की आदत भी डाल सकते हैं। जो लोग धैर्यशील होते हैं, उनकी बुद्धिमता और गंभीरता का स्तर दूसरों से कई गुना अधिक ऊंचा होता है।।

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