अवधूत शब्द का रोचक रहस्य | How to get abdhoot stage

अवधूत क्या है | अवधू क्या है | कैसे प्राप्त हो अवधूत की अवस्था | what is abadhoot | why abdhoot| How to get abadhoot stage | abadhoot for what? | abadhoot word genesis .

अवधूत शब्द का रोचक रहस्य 

                   संपूर्ण विश्व में एक अद्वितीय शब्द, भारत में निर्मित हुआ जिसका नाम "अवधूत" है। यह अवधूत एक ऐसा शब्द है जो बड़ा कीमती है और जिसका आशय उससे भी ज्यादा कीमती है क्योंकि यह अवस्था, दुर्लभ अवस्था होती है। ऐसे व्यक्ति को संभालना वर्तमान के हिसाब से थोड़ा तो कठिन है, क्योंकि यह समाज से बिल्कुल हटके  होते हैं,लेकिन कुछ सम्प्रदाय में यह अवधूत का आशय हट के प्रतीत होता है। इनको सुरक्षा देना इनके अनुरूप वातावरण तैयार करना काफी हद तक सरल होता है । (Interesting secret of the word abdhoot)  इस अवधूत शब्द को गहराई से जानने के लिए आगे बढ़ते हैं और इस अनोखे शब्द को समझते हैं कि क्या है,यह......

अवधुत शब्द की व्युत्पत्ति

                 विद्वानों ने अवधुत शब्द की व्युत्पत्ति
बताई है अ+वधू यानी जिसकी वधू न हो अर्थात अकेला, सांसारिक बंधनो से मुक्त । भाव ग्रहण करने के स्तर पर तो यह व्युत्पत्ति आनंदित कर सकती है मगर यह सही नहीं है।

          अवधूत बना है संस्कृत के धूत शब्द में अव उपसर्ग लगने से । 
अव + धूत = अवधूत ।
         अव उपसर्ग का मतलब होता है दूर, परे, फासले पर ,नीचे,अवतल।
         धूत शब्द भी मूलतः धू धातु से बना है जिसका अर्थ है- झकझोरना, हिलाना, अपने ऊपर से उतार फेंकना, हटाना आदि।

         इससे बने धूत शब्द में हटाया हुआ, भड़काया हुआ, फटकारा हुआ, तिरस्कृत, परित्यक्त, पापमुक्त जैसे भाव उजागर होते हैं। 


        इस तरह देखें तो अवधूत का मतलब निकलता है वह सन्यासी जिसने सांसारिक बंधनों तथा विषयवासनाओं का त्याग कर दिया है। सभी प्रकार से मुक्त, धूत अर्थात परिष्कृत ।

अवधूत का क्या मतलब (What is mean by abdhoot??)

               इस अनोखे शब्द अवधूत का अर्थ होता है - जिसने सब कुछ छोड़ा। जो त्यागी हो गया–परमहंस–जिसने क्रमशः घर-द्वार छोड़ा, गहराई से देखा जाए तो वर्ण-व्यवस्था छोड़ी, समाज छोड़ा, सभ्यता छोड़ी–इतना ही नहीं अंत मे सम्पूर्ण रूप से संन्यास भी जिसने छोड़ा। अवधूत एक परमदशा है।

               अभी तक आपने जाना होगा कि व्यक्ति पहले गृहस्थ होता है,फिर ग्रहस्थ से संन्यस्त बनता है,और एक दिन ऐंसा भी घटित होता है कि फिर संन्यस्त के भी पार हो जाता है। तो अवधूत अवस्था को उपलब्ध होता है।

"अवधू" बड़ा ही गहरा शब्द है जिसे जानकर आप हतप्रभ होंगे -
इसका अर्थ है:-"वधू जाके न होई,सो अवधू कहावे।"

                अब जिसको दूसरे की जरूरत न रही। वधू से मतलब दूसरा। जीवन मे किसी को पत्नी की जरूरत है, किसी को मकान की जरूरत है,किसी को दूकान की जरूरत है, किसी को मित्र की जरूरत है,किसी को बेटे की, बेटी की, कोई न कोई जरूरत बनी ही रहती है। इतना ही काफी नहीं किसी को धन की, किसी को पद की,किसी को प्रतिष्ठा की भी जरूरत भी होती है।
अब ध्यान से समझियेगा,जब तक दूसरे की जरूरत है,तब तक आप अवधू नहीं हैं। अब जो ‘पर’ से मुक्त हो गया, जिसको दूसरे की जरूरत बिल्कुल भी न रही, जो अकेला ही काफी है,जो अपने में ही पूरा है ।  ऐसा सब छोड़ कर जो चला गया। संसार से बिलकुल विरक्त हो गया–परिपूर्ण–पीठ मोड़ ली, वह है- अवधू- मतलब–अवधूत।

अवधूत अवस्था को प्राप्त दो सम्प्रदाय हैं :-

            अवधूत अवस्था को प्राप्त सन्यासी दोनो ही सम्प्रदाय से सम्बन्धित होते हैं -

  पहला शैव
  दूसरा वैष्णव 

                शैव अवधूत वे हैं जो कठोर साधना में जीवन व्यतीत करते हैं। तथा भस्म को पूरे शरीर में लगाकर अधिकतर मौन,बिना कपड़ों के रहकर ही तपस्या रत होते हैं।
इस सम्प्रदाय में विशेष रूप से विचित्र अवधूत के रूप में
गुरु गोरख नाथ जी को जाना जाता है।

                वैष्णव अवधूत वे हैं जो  प्रमुख रूप से ग्रहस्थ रहकर सन्यस्त हो सकते हैं। जिनके मन की अवस्था कुछ  ऐंसी है कि आप जहां हो, वहीं। जैसे हो वैसे ही । ठीक उसी दशा में आपके भीतर रूपांतरण हो जाए। क्योंकि रूपांतरण मनःस्थिति का है–परिस्थिति का नहीं। अर्थात सन्यासी और गृहस्थी एक साथ जरा भी भेद नहीं । कबीर दास जी भी इस विधि से सहमत हैं।

लेकिन कबीर दास जी ने अवधूत के विषय मे बड़ी ही अद्भुत बात कही है-

                 कबीर दास जी के मन में अवधूत का सम्मान है। लेकिन वे उनकी जीवन व्यवस्था से वे कतय राजी नहीं हैं। कारण यह है कि कबीर दास जी कहते हैं- कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं,सब कुछ जहां हैं वहीं हो सकता है। जो व्यक्ति दौड़-दौड़ कर, भाग-भाग कर, जंगल-पहाड़ में तप करते हैं, वह तो बाजार में भी हो सकता है। इतने दूर जाने की जरूरत ही क्या? परमात्मा दूर नहीं–पास है। परमात्मा आपके हृदय में विराजमान है।

              कबीर दास जी का यह अत्यंत ही अनमोल वचन यह है कि संसार छोड़ना, संसार में रहने से बड़ी बात है। लेकिन संसार में रहना और संसार को छोड़कर रहना, संसार छोड़ने से भी कीमती बात है।

             तो कबीर दास जी कहते हैंः अवधूत से भी ऊपर एक दशा है । और वह दशा है–जल में कमलवत, संसार में होकर भी संसार को अपने में न होने देना। कबीर उसके पक्षपाती है।

             आगे वे कहते हैं कि संसार से मुक्त होने से भी बड़ी बात है, संसार में मुक्त होना। वह कबीर दास जी का संसार और परमात्मा के बीच का जोड़ है । संसार और परमात्मा के बीच का समन्वय है।

               तो एक बात तो निश्चित है कि संसारी से बेहतर है त्यागी। लेकिन त्यागी से भी बेहतर है वह, जो संसार में है और संन्यस्त है।

              इस तरह शैव और वैष्णव दोंनो ही सम्प्रदाय में यह उपयोगी रहस्य है जो हमारे जीवन को बदल सकता है। चाहे शेव की तरह अवधूत हो कोई या फिर वैष्णव की तरह से यह अवधूत शब्द की रचना ईश्वर के निकट में रहने की अवस्था है। इतने निकट की उसी में हम जीने लगें। हर सांस में ईश्वर ही वस जाए। ऐंसा है अवधूत का रहस्य ।

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