व्यक्तित्व और निजता में अंतर | personality individual differences in hindi | personality individual

व्यक्तित्व और निजता (personality individual differences in hindi) जीवन के दो अनिवार्य अंतर व्यक्तित्व इन दो शब्दों को एक नहीं समझना चाहिए। ये दोनों बिलकुल ही भिन्‍न हैं। इन दोनों का एक अर्थ नहीं होता। ये दोनों एक नहीं हैं व्यक्तित्व अहंकार से संबंधित है, और निजता स्वरूप से। व्यक्तित्व मात्र एक बाह्य हिस्सा है। अहंकार केंद्र है, और व्यक्तित्व है उसकी बाहरी परिधि।

             वह उसकी निजता बिलकुल भी नहीं। यह शब्द पर्सनैलिटी personality बहुत अर्थपूर्ण है। यह ग्रीक शब्द परसोना persona से निकला है और परसोना persona का अर्थ होता है मास्क–बनावटी चेहरा। ग्रीक नाटक में पात्र बनावटी मुखौटों में अपने चेहरे छिपा लेते थे। इस तरह उनका असली चेहरा तो छिपा रहता था, और बनावटी चेहरा ही असली लगता था। आइये जानते है व्यक्तित्व और निजता (personality individual differences in hindi ) में अंतर हिंदी में

personality individual differences

 

व्यक्तित्व और निजता में अंतर | personality individual differences in hindi     

अर्थ व्यक्तित्व पर्सनैलिटी का अर्थ होता है नकली चेहरा–मास्क, जो कि आप नहीं हैं , परन्तु दिखलाई पड़ते हैं।

           हमारे बहुत सारे चेहरे हैं और इसलिए वस्तुतः किसी का भी एक व्यक्तित्व नहीं है। हमारे बहु-व्यक्तित्व हैं। प्रत्येक को सारे दिन में कितने ही चेहरे बदलने पड़ते हैं। आप एक चेहरे के साथ नहीं रह सकते। वह बहुत कठिन होगा, क्योंकि सारे समय आप अलग-अलग लोगों के साथ होते हैं और आपको चेहरों को बदलना पड़ता है। आप अपने सेवक के सामने वही चेहरा लिए हुए नहीं हो सकते जो कि आप अपने मालिक के सामने लिए होते हैं। 

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आप अपनी पत्नी के समक्ष वही चेहरा नहीं रख सकते जो कि अपनी प्रेमिका के सामने रखते हैं। इसलिए लगातार हमें अपने पास निरंतर बदलते हुए चेहरों का व्यवस्था रखना पड़ता है। सारे दिन व सारी जिंदगी हम निरंतर चेहरे बदलते रहते हैं। आप इसके प्रति सजग हो सकते हैं। आप जान सकते हैं कि कब आप एक चेहरों को बदलते हैं और क्यों बदलते हैं और आपके कितने चेहरे हैं।

 व्यक्तित्व का अर्थ चेहरे का प्रवंधन | what is personality ?

           इसलिए व्यक्तित्व पर्सनैलिटी  का अर्थ होता हैः एक बदलते हुए चेहरे का प्रबंध। और जब आप कहते हैं कि किसी आदमी का महान व्यक्तित्व है, उसका इतना ही अर्थ होता है कि उसके पास और अधिक चेहरे बदलने का प्रबंध है। वह कोई स्थिर व्यक्ति नहीं, उसके पास प्रबंध और अधिक लचीला है। वह सरलता से परिवर्तन कर सकता है। वह एक बड़ा अभिनेता है।

           आपको व्यक्तित्व हर क्षण निर्मित करना पड़ता है, इसलिए कोई भी अपने व्यक्तित्व के साथ आराम से नहीं है। वह एक लगातार प्रयत्न है, इसलिए यदि आप थक गए हैं, तो आपकी चमक खो जाएगी। सबेरे आपके व्यक्तित्व की एक चमक होती है, शाम को वह खो जाती है। सारे दिन भर वह लगातार चेहरे बदलता रहा। इसलिए जब भी हम।व्यक्तित्व पर्सनैलिटी शब्द का प्रयोग करें, तो समझें उसका तात्पर्य है, एक झूठा दिखलावा, जो कि आपने चारों और निर्मित किया है। 

निजता का अर्थ | what is mean individual ?

            निजता  दूसरी ही बात है। निजता का अर्थ वह नहीं, जो कि आपके द्वारा बनाई व खड़ी की जाती है,बल्कि उसका अर्थ होता है आपके सच्चे स्वरूप का असली स्वभाव। यह निजता शब्द भी बहुत अर्थपूर्ण है। इसका अर्थ होता है वह जो कि विभाजित नहीं किया जा सके, अविभाज्य हो । हमारा एक आंतरिक जन्मजात, स्वभाव है जो कि विभाजित नहीं किया जा सकता, जो कि अविभाज्य है। 

योग से सम्बंध 

                 भारत में शब्द "योग" का वही अर्थ होता है–अविभाज्य, अखंड। योग का अर्थ होता है उस सबको फिर से जोड़ना जो कि विभाजित हो गया है, उस सबको फिर से संयुक्त करना जो कि बंट गया है फिर से अविभाज्य को लौटा लाना। 

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          यह निजता रहती है और अधिक गहरी हो जाती है, और अधिक तेज हो जाती है। जिस क्षण भी आप अपने अहंकार को खोते हैं, जिस क्षण भी आप अपने व्यक्तित्व को छोड़ते हैं, आप एक व्यक्ति हो जाते हैं–अद्वितीय। यह एक व्यक्ति हो जाना एक अनूठी घटना है, यह फिर से दोहराई जाने वाली नहीं है। एक कृष्ण फिर से नहीं दोहराए जा सकते। गौतम (सिद्धार्थ )फिर से दोहराए जा सकते हैं। 

निजता, अविभाज्यता,अखंडता |

गौतम-सिद्धार्थ एक साधारण बात है वे पुनरुक्त हो सकते हैं। कोई गौतम सिद्धार्थ हो सकता है। जिस पल गौतम सिद्धार्थ ज्ञान की उपलब्धि कर लेते हैं और बुद्ध होते हैं, तो फिर वह घटना पुनरुक्त नहीं हो सकती। वह अपूर्व है। वह पहले कभी नहीं हुई और वह आगे भी कभी नहीं होगी। यह बुद्धत्व, यह आत्मानुभव का शिखर इतना अनूठा व अपूर्व है कि वह पुनरुक्त नहीं हो सकता। 

             फिर कृष्ण ,राम,बुद्ध,महावीर इतने भिन्‍न क्यों होते हैं? वे भिन्‍न होते हैं, जितनी भी भिन्‍न होने की संभावना है, परन्तु फिर भी वे हैं एक ही, किसी गहरे अर्थों में। जहां तक अविभाज्यता का संबंध है, वे एक हैं जहां तक निजता का संबंध हैं, वे भिन्‍न हैं। वे अविभाज्य तक आ गए हैं। जो कि अस्तित्व का आधारभूत रहता है, उन्होंने उसे जान लिया है। परन्तु इस आधारभूत एकता व उसके पा लेने का तात्पर्य यह नहीं है कि वे अद्वतीय–अपूर्व नहीं हैं।

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                दो साधारण आदमी भिन्‍न हो सकते हैं, परन्तु उनकी भिन्‍नता पूर्ण और समग्र कभी नहीं हो सकती। यहां तक कि उनकी भिन्‍नताओं में भी समानताएं होंगी। वस्तुतः उनकी भिन्‍नता सदैव मात्रा की होगी। यद्यपि वे दोनों परंपरा बिलकुल ही विपरीत हैं, उनका भेद मात्र, मात्रा का होता है। एक मनुष्य जो धार्मिक है और दूसरा मनुष्य जो कि नास्तिक है–विरोधी हैं–वे भी मात्रा में ही भिन्‍न हैं। 

          साधारणतः वे बदलते रहते हैं। भेद सिर्फ ठंडे-गर्म का है–केवल मात्राओं का। परन्तु एक बुद्ध और कृष्ण, एक  महावीर–उनका भेद कभी भी मात्राओं का नहीं है वे कभी भी नहीं मिल सकते। और सब से बड़ा विरोधाभास है कि वे सब उस ऐक्य को पहुंच गए हैं और फिर भी कभी नहीं मिल सकते! वह भेद मात्राओं का नहीं है, यह भेद उनकी अद्वितीयता निजता(individual)का है–अपूर्वता का है।

एक उदाहरण से समझें 

             एक बूंद पानी में गिरा जाता है। और उसके साथ एक हो जाती है, परन्तु वैसा एक होना मृत सदृश है, एक मृत ऐक्य। बूंद बिलकुल खो गई, अब वह कहीं भी नहीं है। बुद्ध इस तरह नहीं गिर रहे हैं वे एक भिन्‍न तरीके से गिर रहे हैं। यदि आप एक लौ सूरज के समक्ष जलाएं, तो वह लौ सूरज से एक हो जाएंगी: परन्तु उसकी अपनी निजता नहीं खो जाएगी, अभी भी वह होगी। यदि हम इस कमरे में पचास लौ जला दें, तो वे सब एक प्रकाश उत्पन्‍न करेंगी, परन्तु प्रत्येक लौ अपने में अपूर्व, अनूठी लौ होगी। इसलिए यह ब्रह्म में लीन होना एक सामान्य विलय नहीं है यह बहुत गूढ़ है। इसकी गूढ़ता यह है कि वह जो कि विलय होता है, शेष रहता है। बल्कि इसके विपरीत पहली बार वह है।

इस बात को कुरूप हम कैसे करते हैं

         यह जो अद्वतीयता है–निजता है, यह विभिन्‍न प्रकार से अनुगूँज करती है और वही उसकी सुंदरता है वह सुंदर है। अन्यथा वह सिर्फ कुरूप होगा। जरा सोचें कि बुद्ध उसी तरह से प्रतिध्वनि करते हैं जैसे कि कृष्ण, तो दुनिया गरीब हो जाएगी–बहुत ही दीन। बुद्ध अपनी तरह से प्रतिसंवेदना करते हैं, एवं कृष्ण अपनी तरह से प्रतिसंवेदन करते हैं। संसार इस तरह से समृद्ध होता है और यह एक सुंदरता की बात है। संसार और अधिक स्वतंत्र होता है और आप भी आप हो सकते हैं।

            परन्तु यह भेद समझने जैसा है कि जब कोई सन्त कहता है कि आप भी आपके जैसे हो सकते हैं, तो उसका अर्थ आपका अहंकार नहीं है।  जब कोई सन्त कहते हैं कि आप हो सकते हैं, तो उनका आशय है कि आपका स्वभाव, आपका अन्तस, आपका अस्तित्व। परन्तु उसकी अपनी निजता  है। वह निजता पर्सनैलिटी नहीं, व्यक्तित्व नहीं। अतः मैं कहती हूं कि वे एक ही अस्तित्व से संबद्ध हैं, पर फिर भी अपनी निजता में। वे उसी गहनता से प्रतिसंवेदन करते हैं, परन्तु एक निजता की भांति। वहां कोई अहंकार का भाव नहीं है, परन्तु अपूर्वता तो रहती है।

 बुद्ध और कृष्ण की अपनी-अपनी निजता  हैं

              यह संसार कोई रंगीन इकाई नहीं है, यह कोई ऊब से भरा नहीं है, इसके बहुरंग हैं, यह बहु ध्वनि वाला है। आप एक स्वर से भी संगीत पैदा कर सकते हैं, परन्तु वह मात्र ऊबा देने वाला होगा, थका देगा । वह जीवंत नहीं होगा: वह सुंदर नहीं होगा। कई स्वरों से एक अधिक सूक्ष्म व मिश्रित लय निकलती है–बहु-स्वर वाली। एक आंतरिक लय चलती है, परन्तु वह उबाने वाली नहीं होती। हर एक स्वर की अपनी निजता है। वह समग्रता की लयबद्धता को अपना योगदान करता है। वह योगदान करता है, क्योंकि उसकी अपनी निजता है। कृष्ण योगदान करते हैं, क्योंकि वे एक कृष्ण हैं। बुद्ध योगदान करते हैं, क्योंकि वे एक बुद्ध हैं।

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 वे एक नया स्वर देते हैं, एक नयी लहर। एक नई ही लय पैदा होती है उनकी वजह से। परन्तु वह तभी संभव है जबकि उनकी अपनी एक निजता हो। और ऐसा गहरी बातों के लिए ही नहीं है। यहां तक बहुत छोटी वे मामूली बातों में भी बुद्ध और कृष्ण भिन्‍न हैं। बुद्ध अपनी ही तरह से चलते हैं। कोई उनकी तरह से नहीं चल सकता। कृष्ण अपनी ही तरह से देखते हैं। कोई भी उस तरह से नहीं देख सकता। उनकी आंखें भी अनूठी हैं। उनके हाव-भाव, उनके शब्द जो वे उपयोग करते हैं, अपूर्व हैं। कोई भी एक-दूसरे के विशिष्ट गुण नहीं ले सकता।

शुभचिंतक लोग जो कि एक मृत एकता को थोपना चाहते हैं

             यह दुनिया अपूर्व स्वरों की राग-रागिनी है और उसके कारण ही संगीत ज्यादा समृद्धिशाली है। हर एक घाटी अपने ही ढंग से अनुगूँज करती है। वे सभी शुभचिंतक लोग जो कि एक मृत एकता को थोपना चाहते हैं, जो कि सब जगह से निजता को पोंछ डालना चाहते हैं, जो कहते हैं कि जैन शास्त्र का तात्पर्य वही है जो गीता का है, जो कहते हैं कि बुद्ध भी वही सिखाते हैं जो कि कृष्ण, उनको पता नहीं है कि वे कितनी मूर्खता की बातें करते हैं। यदि वे अपनी बात में जीत जाएं, तो यह दुनिया बहुत दीन-हीन व दरिद्र हो जाएगी। कैसे बौद्ध शास्त्र वह कह सकते है जो कि गीता कहती है?  और कैसे वह गीता कह सकती है, जो जैन शास्त्र कहते हैं। बौद्ध शास्त्र की अपनी निजता है, जो कि कोई गीता नहीं दोहरा सकती, और कोई  बौद्ध शास्त्र, गीता को पुनरुक्त नहीं कर सकती।

जैसे - जैसे शिखर ऊंचा उठता जाता है , वैसे वैसे वे समानांतर होते जाते हैं

             कृष्ण की अपनी गरिमा है और महावीर की अपनी। वे कभी नहीं मिलते और फिर भी मैं कहती हूं कि वे उसी स्थान पर खड़े हैं। वे कभी नहीं मिलते हैं यह सुंदरता है। और वे कभी भी नहीं मिलेंगे वे समानांतर रेखाओं की भांति हैं जो कि अनंत को जाती हैं, यही मेरा मतलब है अपूर्वता से। वे शिखर की तरह हैं। जितना ही शिखर ऊंचा उठता है, उतनी ही कम संभावना उसके दूसरे शिखर से मिलने की हो जाती है। आप मिल सकते हैं यदि आप जमीन पर हैं तो। प्रत्येक चीज मिल रही हैं। परन्तु जितने उपर आप उठते जाते हैं, शिखर होते जाते हैं, उतनी ही मिलने की संभावना कम होती जाती है। 

               इसलिए वे हिमालय के शिखरों की भांति हैं, जो कि कभी नहीं मिलते। यदि आप उन पर एक झूठी एकता को थोपे, तो आप उन शिखरों को सिर्फ नष्ट कर देंगे। वे भिन्‍न हैं, परन्तु उनकी भिन्‍नता रंगों की नहीं, उनकी भिन्‍नता किसी द्वंद्व के लिए नहीं है।

जीवन के दो अनिवार्य अंतर व्यक्तित्व और निजता personality individual differences in hindi  .

personality individual differences 2020

श्री मति माधुरी बाजपेयी

मण्डला मध्यप्रदेश भारत


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