मन्त्रों का सार | Miracle of mantras

 मन को एक तंत्र में लाना ही मंत्र होता है।

उदाहरणार्थ यदि आपके मन में एक साथ एक हजार विचार चल रहे हैं, तो उन सभी को समाप्त करके मात्र एक विचार को ही स्थापित करना ही मंत्र का लक्ष्य होता है। यह लक्ष्य प्राप्त करने के बाद आपका मस्तिष्क एक आयामी और सही दिशा में गति करने वाला होगा।


मन्त्रों का सार | Miracle of mantras


   जब ऐसा हो जाता है तो कहते हैं कि मंत्र सिद्ध हो गया। ऐसा तब होता है जब मंत्र को लगातार जपते रहते हैं। यदि आपका ध्यान यहां,वहां भटक रहा है तो फिर मंत्र को सिद्ध होने में भी विलंब होगा। 

मन्त्र कब सिद्ध होता है

कहते हैं कि
 'करत-करत अभ्यास से जडमति होत सुजान। 
       रसरी आवत-जात से सिल पर पड़त निसान॥'

    इसी तरह लगातार जप का अभ्यास करते रहने से आपके चित्त में वह मंत्र इस कदर जम जाता है कि फिर नींद में भी वह चलता रहता है और अंतत: एक दिन वह मंत्र सिद्ध हो जाता है। दरअसल, मन जब मंत्र के अधीन हो जाता है तब वह सिद्ध होने लगता है। 

    मंत्र अर्थात मनन करना जब मन और तन किसी शब्द का लगातार मनन करे तो वह मंत्र रूप में परिणित हो जाता है, और मानव देह को महाकाश की शक्ति से जोड़ देता है।

  मंत्रों में प्रयुक्त स्वर, व्यंजन, नाद व बिंदु देवताओं या शक्ति के विभिन्न रूप एवं गुणों को प्रदर्शित करते हैं। मंत्राक्षरों, नाद, बिंदुओं में दैवीय शक्ति छुपी रहती है।

लिंगों के अनुसार मंत्रों के तीन भेद होते हैं-

पुर्लिंग : जिन मंत्रों के अंत में हूं या फट लगा होता है।

स्त्रीलिंग : जिन मंत्रों के अंत में 'स्वाहा' का प्रयोग होता है।

नपुंसक लिंग : जिन मंत्रों के अंत में 'नमः' प्रयुक्त होता है ।

    आवश्यकतानुसार मंत्रों को चुनकर उनमें स्थित अक्षुण्ण ऊर्जा की तीव्र विस्फोटक एवं प्रभावकारी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र, साधक व ईश्वर को मिलाने में मध्यस्थ का कार्य करता है। मंत्र की साधना करने से पूर्व मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा, भाव, विश्वास होना आवश्यक है तथा मंत्र का सही उच्चारण अति आवश्यक है। मंत्र लय, नादयोग के अंतर्गत आता है। मंत्रों के प्रयोग से आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से उत्पन्न व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

गहरे जाप से लाभ

   अच्छे विचार,मंत्र और ईश्वरीय एहसास, या प्रकृति के साथ एकात्म का बार-बार जप करने या ध्यान करते रहने से व्यक्ति की मानसिक शक्ति बढ़ती जाती है। 

    मानसिक शक्ति के बल पर ही व्यक्ति सफल, स्वस्थ और शक्तिशाली महसूस कर सकता है। मंत्र के गहरे कम्पन शरीर मे समाहित होने से एक समय बाद हम खुद के मन या मस्तिष्क को बुरे विचारों से दूर रखकर उसे नए और अच्छे विचारों में बदल सकते हैं। अद्भूत हैं, ये मन्त्र के कम्पन जिसे जीवन मे अपना बना ही लेना चाहिए।

अब जानते हैं कैसे होती है मंत्रों की गणना

    मंत्र की संख्या गिनने के लिए प्रत्येक कर्म के अनुसार माला होना चाहिए।विपरीत परिस्थितियों को छोड़  हाथ की अंगुलियों के पर्वत, अक्षत, पुष्प, चंदन या मिट्टी से जप संख्या की गणना नहीं करना चाहिए। 

  लेकिन काली तंत्र के अनुसार जप में मणिमाला का प्रयोग किया जाना चाहिए। मणिमाला कई पदार्थों की बनी हुई होती है जैसे रत्न, रूद्राक्ष, तुलसी, शंख,कमलगट्टा, चंदन, कुशामूल, स्फटिक, मोती आदि।

मन्त्रों का सार | Miracle of mantras

जाने किस माला से मन्त्र के कम्पन शीघ्रता से सहायक होते हैं।

    काली तंत्र के अनुसार शंखमाला से सौ गुना फल मिलता है। मूंगे से सहस्त्र, स्फटिक से दस सहस्त्र, मुक्तक से लाख, कमल बीजों की माला से दस लाख, कुशा मूल की माला से सौ करोड़ तथा रूद्राक्ष से मंत्र जप का अनंत कोटि फल मिलता है।

कब से प्रारंभ करें मन्त्र जाप

   शुभ कार्य का प्रारंभ यदि शुभ समय में किया जाए तो जल्दी परिणाम मिलता है। मंत्र जप प्रारंभ करने के लिए गुरु पुष्य या रवि पुष्य नक्षत्र सर्वश्रेष्ठ अनुभूत किया गया है।

   महीनों के अनुसार देखा जाए तो चैत्र, बैशाख, श्रावण, भाद्रपद, माघ, फाल्गुन ये छह महीने मंत्र जप में तुरंत सिद्धिदायक कहे गए हैं। इनके अलावा जिस ग्रह का मंत्र जप किया जा रहा है उसी के निश्चित दिन-वार में मंत्र जप प्रारंभ किया जा सकता है।

बीज मन्त्रों का प्रभाव

    बीज मंत्र एक ऐसी ही शक्ति है, जिससे मनुष्य स्वयं को ईश्वर के समीप पाता है। और शरीर में स्थित चक्रों की शक्ति को जाग्रत कर स्वयं ब्रह्म अहम ब्रह्मस्मि की अवस्था तक पहुंच सकता है। 

   बीज मंत्रो से अनेकों रोगों का निदान सफलता पूर्वक किया जा सकता है। आवश्यकता केवल अपने अनुकूल प्रभावशाली मंत्र चुनने और उसका शुद्ध उच्चारण से मनन-गुनन करने की है। 

क्या आप बीज मन्त्रों का मनन या गुनन करते हैं?

 यदि नहीं तो आइये नीचे जानते हैं।

कैसे होता है बीज मन्त्रो से जीवन मे चमत्कार

      बीज मन्त्र के अर्थ से अधिक आवश्यक उसका शुद्ध उच्चारण ही है। जब एक निश्चित लय और ताल से मंत्र का सतत् जप चलता है, तो उससे नाडियों में स्पंदन होता है। उस स्पंदन के घर्षण से विस्फोट होता है। और विस्फोट से ऊर्जा उत्पन होती है, जो षट्चक्रों को चैतन्य करती है। 

      इस पूरी प्रक्रिया के समुचित अभ्यास से शरीर में ऊर्जा प्रायौगिक रुप से उत्पन्न होती है, जिससे शरीर की आवश्कता के अनुरुप शरीर का पोषण करने में सहायक हारमोन्स आदि का सामन्जस्य बना रहता है। फिर तदनुसार शरीर की रोगों से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ने लगती है।

किसी भी तरह की भूल में नहीं रहें,आपकी दैनिक वाणी भी है मन्त्र :-

    ऐसा नहीं है कि मंत्र केवल वही होते हैं जो शास्त्रों में लिखे होते हैं। हम दिनभर में जो भी बोलते हैं वह मंत्रमय ही होता है। जिसका कहीं न कहीं सुक्ष्म प्रभाव भी होता है और हमारे द्वारा उच्चारित ध्वनि ब्रह्मांड में निरंतर प्रवाहित होती रहती है। इसका जीता जागता उदाहरण महाभारत काल मे बोली गई ध्वनियों में से कुछ ध्वनि सशब्द खोजी गई है,उस काल के कुछ खास व्यक्तियों की ध्वनियाँ पहचानी,लिखी व संग्रहित की गईं हैं। 

   अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिक भी यह साबित कर चुके हैं कि किसी व्यक्ति द्वारा कहे गए शब्द कभी नष्ट नहीं होते।।

आइये जानते हैं क्या है रहस्य मां काली की माला के 49 मुंडो का??

   देव-देवियों के संदर्भ में देखे तो मां काली के गले में जो मुंड माला है उसमें भी 49 मुंड ही है। इसलिए ये सब इन 49 चक्रों या वर्णों की तरफ ही इशारा करते हैं, जो मानव के उत्थान और उसे ईश्वर तुल्य बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

आइये जानते हैं भगवान शिव जी की खोज को :-

   जिस तरह शिव ने तंत्र शास्त्र में 49 चक्र अक्षरों या वर्णों की व्याख्या की है। उसी तरह मानव शरीर में भी सिर से पैर तक 49 अक्षर या वर्ण होते हैं।

   ये वर्ण शरीर के सात चक्रों के साथ संयोजित हैं, हमारे शरीर में भी सात चक्रों के मध्य हर चक्र में लगभग 7 चक्र और हैं। इस तरह पूरे चक्रों की संख्या 49 हैं। कहीं-कहीं हमारे शास्त्रों में भी 7 लोकों का स्मरण किया गया है। कहीं-कहीं तो नौ स्तरों का भी उल्लेख है।

कैसे हुआ बीज मन्त्रों निर्माण :-

     इन 49 वर्णों में से कुछ वर्णों में ब्रह्मांड की वो शक्ति ज्यादा ही निहित रहती है, जिसे हमारे प्राचीन ऋषि और योगीजन पहले ही जान चुके थे। उन्हीं वर्णों को संयोजित करके हमारे ऋषियों ने इन शक्तिशाली बीजों का निर्माण किया और इन्हें बीज मंत्र नाम दिया तात्पर्य यह है कि जो महाकाश से उस शक्ति को आकर्षित कर सके।

मन्त्र से साक्षात्कार कब

   किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रयुक्त शब्दों का समूह मंत्र कहलाता है। जो शब्द जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है उसे उस देवता या शक्ति का मंत्र कहते हैं। मंत्र एक ऐसी गुप्त ऊर्जा है, जिसे हम जागृत कर इस अखिल ब्रह्मांड में पहले से ही उपस्थित इसी प्रकार की ऊर्जा से एकात्म कर उस ऊर्जा के लिए देवता (शक्ति) से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं।

मंत्रों का गुप्त रहस्य

    ऊर्जा अविनाशिता के नियमानुसार ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन्‌ एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। अतः जब हम मंत्रों का उच्चारण करते हैं, तो उससे उत्पन्न ध्वनि एक ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रेषित होकर जब उसी प्रकार की ऊर्जा से संयोग करती है, तब हमें उस ऊर्जा में छुपी शक्ति का आभास होने लगता है। 

    रोग निवारण में मंत्र का प्रयोग रामबाण औषधि का कार्य करता है। मानव शरीर में 108 जैविकीय केंद्र (साइकिक सेंटर) होते हैं जिसके कारण मस्तिष्क से 108 तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) उत्सर्जित करता है।

क्यों हुआ 108 मनकों की माला और जप का एक साथ विधान :-

      हमारे ऋषि-मुनियों ने मंत्रों की साधना के लिए 108 मनकों की माला तथा मंत्रों के जाप की आकृति निश्चित की है। मंत्रों के बीज मंत्र उच्चारण की 125 विधियाँ हैं। मंत्रोच्चारण से या जाप करने से शरीर के 6 प्रमुख जैविकीय ऊर्जा केंद्रों से 6250 की संख्या में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जो इस प्रकार हैं :

मूलाधार 4 ×125=500
स्वधिष्ठान 6 ×125=750
मणिपूर 10 ×125=1250
हृदयचक्र 13 ×125=1500
विशुद्धिचक्र 16 ×125=2000
आज्ञाचक्र 2 ×125=250
कुल योग 6250 (विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों की संख्या)

आइये जानते क्या कहता है भारतीय कुण्डलिनी विज्ञान :-

   भारतीय कुंडलिनी विज्ञान के अनुसार मानव के स्थूल शरीर के साथ-साथ 6 अन्य सूक्ष्म शरीर भी होते हैं। विशेष पद्धति से सूक्ष्म शरीर के फोटोग्राफ लेने से वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली बीमारियों या रोग के बारे में पता लगाया जा सकता है। सूक्ष्म शरीर के ज्ञान के बारे में जानकारी न होने पर मंत्र शास्त्र को जानना अत्यंत कठिन होगा।

    मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियों पर प्रयोगों द्वारा ध्वनि परिवर्तन (मंत्रों) से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के उत्पन्न होने को प्रमाणित कर लिया गया है। मानव शरीर से 64 तरह की सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं जिन्हें 'धी' ऊर्जा कहते हैं। जब धी का क्षरण होता है तो शरीर में व्याधि एकत्र हो जाती है।

पेड़ पौधे भी मन्त्रों से होते हैं प्रभावित :-

   ऋषियों की अद्भुत खोज हुई है कि मंत्रों का प्रभाव वनस्पतियों पर भी पड़ता है।

वेदों में गहन शोध हुआ मन्त्रों का :-

    चारों वेदों में कुल मिलाकर 20 हजार 389 मंत्र हैं, प्रत्येक वेद का अधिष्ठाता देवता है। ऋग्वेद का अधिष्ठाता ग्रह गुरु है। यजुर्वेद का देवता ग्रह शुक्र, सामवेद का मंगल तथा अथर्ववेद का अधिपति ग्रह बुध है। मंत्रों का प्रयोग ज्योतिषीय संदर्भ में अशुभ ग्रहों द्वारा उत्पन्न अशुभ फलों के निवारणार्थ किया जाता है। ज्योतिष वेदों का अंग माना गया है। इसे वेदों का नेत्र कहा गया है। भूत ग्रहों से उत्पन्न अशुभ फलों के शमनार्थ वेदमंत्रों, स्तोत्रों का प्रयोग अत्यन्त प्रभावशाली माना गया है।

     वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है कि ध्वनि उत्पन्न करने में नाड़ी संस्थान की 72 नसें आवश्यक रूप से क्रियाशील रहती हैं। अतः मंत्रों के उच्चारण से सभी नाड़ी संस्थान क्रियाशील रहते हैं।

      बीज मंत्रों से अनेक रोगों का निदान सफल है। आवश्यकता केवल अपने अनुकूल प्रभावशाली मंत्र चुनने और उसका शुद्ध उच्चारण करने की है। पौराणिक, वेद, शाबर आदि मंत्रों में बीज मंत्र सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं उठते-बैठते, सोते-जागते उस मंत्र का सतत् शुद्ध उच्चारण करते रहें। आपको चमत्कारिक रुप से अपने अन्दर दिखाई देने लगेगा। 

विशेष ध्यान दीजिए कि :- यह बात सदैव ध्यान रखें कि बीज मंत्रों में उसकी शक्ति का सार उसके अर्थ में नहीं बल्कि उसके विशुद्ध उच्चारण को एक निश्चित लय और ताल से करने में है। बीज मंत्र में सर्वाधिक महत्व उसके बिन्दु में है और यह ज्ञान केवल वैदिक व्याकरण के सघन ज्ञान द्वारा ही संभव है। 

कैसे हो उच्चारण :- आप स्वयं देखें कि एक बिन्दु के तीन अलग-2 उच्चारण हैं। गंगा शब्द ‘ङ’ प्रधान है। गन्दा शब्द ‘न’ प्रधान है। गम्भीर शब्द ‘म’ प्रधान है। अर्थात इनमें क्रमशः ङ, न और म, का उच्चारण हो रहा है।

जाने क्यों ऋषियों ने प्रतीक के रूप में दैवीय शक्ति की खोज की ??

* भय दूर करने बाली शैलपुत्री ।
* स्मरण शक्ति बढ़ाने बाली ब्रह्मचारिणी । 
* हृदय रोग देवी चंद्रघंटा।
* रक्त शोधन देवी कुष्माण्डा। 
* कफ रोग-नाशक देवी स्कंदमाता। 
* कंठ रोग- शमन देवी कात्यायनी। 
* मस्तिष्क विकार-नाशक देवी कालरात्रि। 
* रक्त शोधक देवी महागौरी। 
* बलबुद्धि बढ़ाने बाली देवी सिद्धिदात्री।

अंतिम रूप से इस लेख के निष्कर्ष के रूप में लिखती हूँ कि प्रत्येक रूप के साथ जुड़ी है ध्वनि

  अस्तित्व में रूप या आकार अलग-अलग तरह के होते हैं और प्रत्येक रूप के साथ एक ध्वनि निश्चित ही जुड़ी होती है और हर ध्वनि के साथ एक रूप जुड़ा होता है।

क्या आप जानते हैं??

    जब आप कोई ध्वनि मुंह से निकालते हैं, तो उसके साथ एक रूप बनता है। ध्वनियों को एक खास तरह से उपयोग करने का एक पूरा विज्ञान है, जिससे सही तरीके के रूप बनाया जा सके।

   मंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका आप उच्चारण करते हैं, यह वह चीज है जो आप बनना चाहते हैं। क्योंकि पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक विशेष रूप से जटिल संगम है। उसमें से हमने कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह कार्य करती हैं।

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